महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार के निधन ने सत्तारूढ़ महायुति के भीतर समीकरणों को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। भाजपा, शिवसेना शिंदे गुट और एनसीपी के बीच बनी शीर्ष स्तरीय समझ अब किस दिशा में जाएगी, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है। आने वाले बीएमसी मेयर चुनाव इस गठबंधन की मजबूती और अंदरूनी खींचतान दोनों की असली परीक्षा साबित हो सकते हैं।
महायुति में नेतृत्व का खालीपन और नए सवाल
डिप्टी सीएम अजित पवार तीनों दलों के बीच संतुलन बनाने वाले अहम चेहरा माने जाते थे। उनके जाने के बाद यह चर्चा तेज है कि एनसीपी गुट से कौन आगे आएगा और गठबंधन में उनकी भूमिका कैसी होगी। सुनेत्रा पवार या प्रफुल्ल पटेल जैसे नामों को लेकर अटकलें लग रही हैं, लेकिन फिलहाल कोई औपचारिक संकेत सामने नहीं आया है।
एकनाथ शिंदे की बढ़ती सौदेबाजी की ताकत?
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि बदले हालात में एकनाथ शिंदे की रणनीतिक अहमियत बढ़ सकती है। बीएमसी मेयर पद को लेकर पहले से ही भाजपा और शिवसेना शिंदे गुट के बीच बातचीत चल रही थी, जो अब और जटिल होती दिख रही है। अजित पवार के असमय निधन से यह प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।
बीएमसी चुनाव: आंकड़ों की जंग
227 सदस्यों वाली बृहन्मुंबई महानगरपालिका में मेयर बनाने के लिए 114 पार्षदों का समर्थन जरूरी है। पिछले नतीजों में भाजपा को 89 और शिवसेना शिंदे गुट को 29 सीटें मिली थीं, जबकि शिवसेना यूबीटी 65 पर रही। कांग्रेस, एआईएमआईएम, मनसे और अन्य दलों के साथ एनसीपी अजित पवार गुट की कुछ सीटें भी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
पंजीकरण प्रक्रिया में देरी से बढ़ी अनिश्चितता
मेयर चुनाव से पहले नगरसेवकों के गुट पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। आरक्षण की घोषणा के बाद तय समयसीमा निकल चुकी है और अब फरवरी के पहले सप्ताह में यह कवायद पूरी होने की संभावना जताई जा रही है। भाजपा और शिवसेना शिंदे गुट संयुक्त रूप से पंजीकरण कराएंगे या अलग-अलग, यह भी अभी तय नहीं है।
25 साल बाद बदला बीएमसी का चेहरा, अब अगला मोड़
दो दशक से ज्यादा समय तक एक ही परिवार के प्रभाव में रहने के बाद बीएमसी की सत्ता बदली थी और 2022 से प्रशासकीय व्यवस्था चल रही है। अब नए मेयर चुनाव के साथ यह तय होगा कि महायुति अपनी एकजुटता बरकरार रख पाती है या अजित पवार के बाद समीकरणों में बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा।