महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनाव से पहले ही राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। मतदान से पहले ही बीजेपी-नेतृत्व वाली महायुति ने बड़ा सियासी संदेश दे दिया है। राज्य के अलग–अलग नगर निगमों में 68 पार्षद निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए हैं। इस घटनाक्रम ने सत्ता पक्ष को बढ़त दिलाई है, वहीं विपक्ष ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।
बिना वोट डले मिली बड़ी बढ़त
महाराष्ट्र में 15 जनवरी को होने वाले नगर निकाय चुनावों से पहले महायुति ने मजबूत शुरुआत की है। नामांकन वापसी की प्रक्रिया पूरी होते ही अलग–अलग नगर निगमों में कुल 68 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। इनमें सबसे ज्यादा सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई हैं, जबकि सहयोगी दलों को भी उल्लेखनीय सफलता मिली है। यह स्थिति बताती है कि कई जगहों पर मुकाबला होने से पहले ही राजनीतिक तस्वीर साफ हो चुकी है।
किन शहरों में दिखा असर
निर्विरोध जीत का सबसे बड़ा असर ठाणे जिले के कल्याण–डोंबिवली क्षेत्र में देखने को मिला। इसके अलावा पुणे, पिंपरी–चिंचवाड़, पनवेल, भिवंडी, धुले, जलगांव और अहिल्यानगर जैसे अहम शहरी इलाकों में भी महायुति के उम्मीदवारों ने बिना मुकाबले जीत दर्ज की। इन सीटों ने चुनाव से पहले ही गठबंधन को मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी है।
सत्तापक्ष का दावा: भरोसे की जीत
महायुति नेताओं का कहना है कि यह परिणाम शहरी मतदाताओं के भरोसे और सरकार के कामकाज का संकेत है। उनके अनुसार, विकास कार्यों और संगठनात्मक रणनीति की वजह से विपक्ष मजबूत उम्मीदवार मैदान में नहीं उतार सका। कई नेताओं ने यहां तक दावा किया है कि प्रमुख नगर निगमों में अगला नेतृत्व भी महायुति के हाथ में होगा।
विपक्ष के आरोप और सवाल
दूसरी ओर विपक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कई जगहों पर दबाव और डर के माहौल में उम्मीदवारों को नाम वापस लेने के लिए मजबूर किया गया। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चिंताजनक संकेत है और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
15 जनवरी पर टिकी नजर
राज्य की 29 नगर निगमों में 15 जनवरी को मतदान होना है और अगले दिन मतगणना की जाएगी। हालांकि कई सीटों पर फैसला पहले ही हो चुका है, लेकिन शेष सीटों पर मुकाबला दिलचस्प माना जा रहा है। इन चुनावों के नतीजे आने वाले समय में महाराष्ट्र की शहरी राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।