महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर करवट लेती दिख रही है। अजित पवार के निधन के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों के संभावित विलय को लेकर नई चर्चाएं तेज हो गई हैं। जहां एक ओर शरद पवार गुट की ओर से संकेत मिल रहे हैं, वहीं अजित पवार खेमे के नेता अब एनडीए के साथ मजबूती से खड़े रहने की बात कह रहे हैं। इस बदलते रुख ने राजनीतिक समीकरणों को और उलझा दिया है।
एनडीए पर कायम अजित पवार गुट
एनसीपी के महाराष्ट्र अध्यक्ष सुनील तटकरे ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी फिलहाल एनडीए के साथ मजबूती से बनी रहेगी। उन्होंने संकेत दिया कि जो नेता सत्ता गठबंधन के साथ चलना चाहते हैं, उन्हें उसी राजनीतिक लाइन को स्वीकार करना होगा। इस बयान को शरद पवार के नेतृत्व वाले गुट के लिए एक अप्रत्यक्ष संदेश माना जा रहा है, जिससे दोनों खेमों के बीच दूरी और स्पष्ट होती दिख रही है।
विलय पर बदला-बदला सा माहौल
अजित पवार के जीवनकाल में दोनों गुटों के एक होने की संभावनाओं पर खुलकर बात की गई थी। उन्होंने कार्यकर्ताओं की भावना का हवाला देते हुए एकजुट होने की इच्छा जताई थी। लेकिन विमान हादसे में उनके निधन के बाद समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। अब उनके समर्थक नेता पहले से ज्यादा सतर्क दिखाई दे रहे हैं और किसी भी फैसले में जल्दबाजी से बचने की बात कर रहे हैं।
शरद पवार गुट की रणनीति
एनसीपी-एसपी के नेताओं ने फिलहाल संयम बरतने का रुख अपनाया है। परिवार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि शोक अवधि पूरी होने के बाद ही किसी राजनीतिक फैसले पर विचार किया जाएगा। विधायक रोहित पवार ने भी कहा है कि आगे की रणनीति सोच-समझकर तय होगी। इससे साफ है कि शरद पवार गुट फिलहाल खुले पत्ते नहीं खेलना चाहता।
मुख्यमंत्री के बयान से बढ़ी बहस
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दोनों गुटों के विलय की खबरों को फिलहाल खारिज करते हुए कहा कि यदि कोई गंभीर बातचीत चल रही होती तो उन्हें इसकी जानकारी जरूर होती। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार को किसी तारीख या औपचारिक चर्चा की सूचना नहीं है। उनके इस बयान से राजनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है और अटकलें और तेज हो गई हैं।
स्मारक योजना और सियासी संदेश
इसी बीच बारामती में अजित पवार की स्मृति में भव्य स्मारक बनाने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है, जिसकी पहल शरद पवार कर रहे हैं। विद्या प्रतिष्ठान परिसर में प्रस्तावित इस स्मारक को राजनीतिक और भावनात्मक दोनों नजरियों से अहम माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दिनों में दोनों गुटों के बीच संवाद की गुंजाइश बनी रह सकती है, लेकिन मौजूदा बयानों से साफ है कि फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में रणनीतिक दबाव और खींचतान का दौर जारी रहेगा।