बिहार के चुनावी दंगल में जिस नाम ने सबसे ज्यादा शोर मचाया है, वो कोई और नहीं बल्कि बीजेपी प्रत्याशी मैथिली ठाकुर रही, क्योंकि जिस सीट को दशकों से राजद का सुरक्षित किला माना जाता था, वहां पहली बार एक युवा लड़की ने ऐसी दहाड़ लगाई कि विरोधियों की नींद उड़ गई. अलीनगर विधानसभा, जिसे पहले RJD का अभेद्य गढ़ कहा जाता था, वहां मैथिली ने पहली ही बार चुनाव लड़कर विजय पताका फहरा दी. मैथिली ने न सिर्फ जीत दर्ज की बल्कि जीत का ऐसा फासला बनाया कि RJD के दिग्गज भी सोच में पड़ गए कि आखिर ये खेल हुआ कैसे?
अलीनगर की कहानी भी दिलचस्प
बता दें अलीनगर की कहानी भी दिलचस्प है.1990 के बाद पूरा मिथिलांचल RJD के जातीय समीकरणों से चलता था. बेनीपुर को परिसीमन में अलीनगर बनाया गया ताकि अब्दुल बारी सिद्दिकी जैसे RJD के दिग्गजों का दबदबा जारी रहे क्योंकि यहां मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद RJD के लिए सीट आसान हो गई थी सिद्दिकी 2010 और 2015 में यहां से जीते भी लेकिन 2025 में समीकरण उल्टा हो गया क्योंकि मैदान में मैथिली ठाकुर थीं जो एक नया चेहरा, नई ऊर्जा, और जनता से सीधा कनेक्शन के साथ जुड़ी, RJD ने इस बार ब्राह्मण उम्मीदवार विनोद मिश्र को उतारा, लेकिन जो सीट सिद्दिकी के लिए काटी गई थी उसे एक युवा लड़की ने ऐसे फतह किया कि पूरा गणित ध्वस्त हो गया.
जनता से सीधा और भावनात्मक रिश्ता
बताया जाता है कि मैथिली ठाकुर की सबसे बड़ी ताकत उनके गीत या लोकप्रियता नहीं, बल्कि जनता से सीधा और भावनात्मक रिश्ता रहा है, उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से बात की, महिलाओं की समस्याएं सुनीं, युवाओं के सपने समझे और खुद को इलाके की बेटी के रूप में पेश किया. सोशल मीडिया पर उनकी पकड़ पहले से मजबूत थी ही, लेकिन जमीन पर उनकी पहुंच ने माहौल बदल दिया. जहां RJD केवल जातीय समीकरणों में उलझा हुआ था, वहीं मैथिली भरोसे, सुरक्षा, विकास और सांस्कृतिक जुड़ाव का चेहरा बनकर उभरीं. युवा, सवर्ण, गैर-यादव OBC और बड़ी संख्या में महिलाओं ने खुलकर उनका साथ दिया. माना जा रहा है कि यही वो लहर थी जिसने विपक्ष को टिकने ही नहीं दिया.
जीत का बड़ा कारण मोदी-योगी फैक्टर
मैथिली ठाकुर की जीत का दूसरा बड़ा कारण मोदी-योगी फैक्टर रहा, क्योंकि बीजेपी ने मिथिला में जिस तरह से रणनीति बनाई, उसने RJD की नींव हिला दी. मैथिली की सरलता और जनता से कनेक्शन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता का बड़ा सहारा मिला. ये सीट पहली बार जातीय गणित से निकलकर विकास, सुरक्षा और नेतृत्व की राजनीति में बदल गई. चुनाव प्रचार के दौरान मैथिली ने सिर्फ मंचों पर भाषण नहीं दिए बल्कि चौपालों में बैठीं, खेतों में गईं, महिलाओं के साथ समय बिताया. यही वजह रही कि अलीनगर में जहां हवा RJD के पक्ष में मानी जा रही थी, वहां अचानक पूरा माहौल बीजेपी की तरफ झुक गया.
बिहार की राजनीति अब बदल रही
चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि बिहार की राजनीति अब बदल रही है और इस बदलाव का चेहरा मैथिली ठाकुर बनी हैं. वो न सिर्फ अलीनगर से इतिहास रचकर निकलीं बल्कि बिहार की सबसे कम उम्र की विधायक बनकर युवा राजनीति का नया अध्याय भी लिख गईं. राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि मैथिली सिर्फ विधायक नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति का उभरता तूफान बन चुकी है, जो आने वाले समय में बड़े-बड़े दिग्गजों को टक्कर देने की क्षमता रखती है. अब आगे क्या होता है ये देखने वाली बात होगी