छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर गांव में स्थित मामा-भांजा मंदिर अपनी अनोखी कहानी, शिल्पकला और चमत्कारिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। 11वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर को लेकर कहा जाता है कि इसे बिना किसी यंत्र या मशीन के, सिर्फ एक ही दिन में तैयार किया गया था। खास बात यह है कि यहां आज भी मामा और भांजा एक साथ प्रवेश नहीं कर सकते।
एक दिन में बना मंदिर
बारसूर गांव का मामा-भांजा मंदिर 11वीं शताब्दी में राजा बाणासुर द्वारा बनवाया गया था। इस मंदिर का निर्माण मामा और भांजा शिल्पकारों ने मिलकर किया। मान्यता है कि बिना आधुनिक साधनों के, सिर्फ एक दिन में विशाल बलुई पत्थरों को काटकर और तराशकर इसे तैयार किया गया।
अद्भुत शिल्पकला की मिसाल
मंदिर की दीवारों पर बने शैलचित्र उस समय की उत्कृष्ट कला और कारीगरी को दर्शाते हैं। मंदिर के शीर्ष के नीचे मामा और भांजा शिल्पकारों की प्रतिमाएं भी उकेरी गई हैं। गर्भगृह में भगवान शिव, गणेश और नरसिंह की मूर्तियां विराजमान हैं। इसे मुख्य रूप से शिव और गणेश का मंदिर माना जाता है।
अनोखी मान्यता अब भी कायम
इस मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक परंपरा यह है कि मामा और भांजा एक साथ मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते। किवदंती के अनुसार, ऐसा करने से उनके रिश्तों में मतभेद हो जाता है। यही वजह है कि आज भी लोग इस परंपरा को मानते हैं और इसे श्रद्धा से पालन करते हैं।