माँ कामाख्या की मान्यता : भारत एक ऐसा देश है जहाँ देवी-पूजा की गहरी परंपरा रही है. इन्हीं देवी स्वरूपों में एक अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमयी देवी हैं — माँ कामाख्या. असम के गुवाहाटी नगर के पास नीलाचल पर्वत पर स्थित कामाख्या मंदिर, शक्तिपीठों में से एक प्रमुख पीठ माना जाता है. यह स्थान तांत्रिक साधना, आध्यात्मिक शक्ति और नारी-शक्ति के पूजन का केंद्र है.
माँ कामाख्या को कामना की देवी माना जाता है और मान्यता है कि वे अपने भक्तों की सच्ची मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण करती हैं. शास्त्रों के अनुसार, जब माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव अत्यंत व्याकुल होकर उनका शव लेकर पूरे ब्रह्मांड में विचरण करने लगे. इस स्थिति को देखकर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, जो अलग-अलग स्थानों पर गिरकर शक्तिपीठ बने.
माँ कामाख्या का मंदिर उस स्थान पर बना है जहाँ माता सती का "योनि" भाग गिरा था. इसी कारण यह स्थल स्त्री-शक्ति का प्रतीक माना जाता है और यहाँ विशेष रूप से "योनि पूजा" की जाती है. माँ कामाख्या की विशेषता यह भी है कि यहाँ किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि एक प्राकृतिक चट्टान (योनि-आकार) से झरने जैसा रक्त-रंजित जल प्रवाहित होता है, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है.
यह स्थल वर्ष में एक बार — अंबुबाची मेले के दौरान — तीन दिन के लिए बंद रहता है, जिसे माता की रजस्वला अवस्था मानी जाती है. इस दौरान माँ को 'विश्राम' दिया जाता है, और चौथे दिन भव्य पूजा के साथ मंदिर खोला जाता है. कामाख्या मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि तंत्र साधना और शक्ति उपासना के लिए भी प्रसिद्ध है. यहाँ पर विशेष रूप से तांत्रिक साधक आते हैं और यह मंदिर तांत्रिक शक्ति के नौ रूपों की उपासना का केंद्र भी है.
माँ के नौ रूपों को नवदुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है — जिनमें धूमावती, बगला मुखी, तारा देवी, भैरवी आदि शामिल हैं. माँ कामाख्या की मान्यता केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे शक्ति, प्रकृति, नारीत्व और कामना की देवी हैं. यह मंदिर हमें यह सिखाता है कि स्त्री-शक्ति ही सृष्टि की मूल है और उसका सम्मान करना ही सच्ची भक्ति है.