
BSP devise new strategy: उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुर्खियों में है। कांशीराम की पुण्यतिथि पर लखनऊ में हुई विशाल रैली में मायावती ने समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर तीखा हमला बोला। मायावती का कहना था कि सपा सत्ता में रहते दलितों को नजरअंदाज करती है और चुनाव आते ही PDA का नारा देकर उनका वोट हासिल करने की कोशिश करती है। इस बयान से साफ है कि बसपा अब अपने पारंपरिक वोट बैंक — खासकर जाटव समुदाय — को फिर से एकजुट करने की कवायद में जुटी है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि यह कोर वोट बैंक अब पहले जितना स्थिर नहीं रहा है।
जाटवों की वफादारी में आई दरार
2007 में चरम पर रही बसपा को तब 30 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे, जिसमें बड़ी हिस्सेदारी जाटवों की थी। लेकिन 2012 से पार्टी का ग्राफ लगातार गिरा और 2022 में वोट शेयर घटकर 12.88 फीसदी रह गया। आंकड़ों के अनुसार, 2017 में 87 फीसदी जाटवों ने बसपा को वोट दिया था, जो 2022 में घटकर 65 फीसदी रह गया। यानी करीब एक चौथाई जाटव वोटर अब भाजपा और सपा जैसे विकल्पों की ओर झुक गए हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में तो बसपा का वोट शेयर 9 फीसदी के आसपास सिमट गया, जिससे साफ है कि युवा जाटव अब ‘हाथी’ के बजाय विकास और सियासी प्रभाव वाले चेहरों की ओर देख रहे हैं।
मायावती का नया दांव और सपा की चिंता
लखनऊ की ताजा रैली बसपा के पुनरुत्थान का संकेत मानी जा रही है। मायावती के साथ मंच साझा करते आकाश आनंद ने भी यह दिखाया कि पार्टी युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। रैली में उमड़ी भीड़ ने बसपा कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरा है और यह सपा के PDA फॉर्मूले को सीधी चुनौती देता दिख रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर यह रफ्तार 2027 के विधानसभा चुनावों तक बनी रही, तो बसपा फिर से जाटव वोटरों को अपने पाले में ला सकती है। ऐसे में यूपी की राजनीति एक बार फिर त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ सकती है, जहां मायावती का यह दांव अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले को कमजोर कर सकता है।