UP elections 2027: मायावती ने 2027 यूपी चुनाव के लिए आक्रामक रणनीति अपनाई है। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो ने अभी से टिकट वितरण की रेस में सबको पीछे छोड़ दिया है। वह अगले एक महीने में 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी या प्रभारी घोषित कर देंगी। यह कदम ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण पर बड़ा दांव है, जो 2007 की याद दिलाता है जब इसी फॉर्मूले से बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था।
बसपा की वापसी की सियासी चाल
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी में बसपा सबसे आगे नजर आ रही है। अन्य दल अभी घोषणाओं में पीछे हैं, लेकिन मायावती ने चार प्रत्याशी पहले ही घोषित कर दिए हैं। दो ब्राह्मण और दो मुस्लिम। इसमें जालौन की माधौगढ़ सीट से आशीष पांडेय (ब्राह्मण) को प्रभारी बनाया गया है, जो पार्टी का पहला बड़ा संकेत है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, यूपी की 403 सीटों में से करीब 50 प्रतिशत पर ब्राह्मण प्रत्याशी उतारने की योजना है। ब्राह्मणों को टिकट, मुस्लिमों को संगठन में मजबूत भूमिका और दलितों को कोर वोट बैंक बनाकर सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश है।
2007 के 'सोशल इंजीनियरिंग' फॉर्मूले की पुनरावृत्ति
यह रणनीति 2007 के 'सोशल इंजीनियरिंग' फॉर्मूले की याद दिलाती है, जब ब्राह्मणों को 51 टिकट देकर 20 जीते, मुस्लिमों को 61 में से 29 जीते और दलित वोटों के साथ 206 सीटें हासिल कीं। तब ब्राह्मणों का 16-20 प्रतिशत समर्थन और मुस्लिमों का 17 प्रतिशत योगदान निर्णायक था। अब भाजपा से नाराज ब्राह्मणों (विशेषकर यूजीसी नियमों और अन्य मुद्दों पर) को लुभाने की कोशिश है। हाल में कई ब्राह्मण नेता भाजपा छोड़ बसपा में शामिल हुए हैं।
फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण
मायावती का यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला, यह भाजपा के ब्राह्मण वोट बैंक (2017-2022 में 87 प्रतिशत तक) में सेंध लगाने की कोशिश है, जहां ब्राह्मण 100 से अधिक विधानसभा सीटों में निर्णायक हैं। दूसरा, मुस्लिम-ब्राह्मण गठजोड़ से सपा और कांग्रेस के वोट कट सकते हैं। तीसरा, बसपा की 2022 में सिर्फ 1 सीट और 2024 लोकसभा में कमजोर प्रदर्शन के बाद यह 'कमबैक' की शुरुआत है।
दलित वोटों में बीएसपी का शेयर घटा
हालांकि चुनौतियां भी हैं। दलित वोटों में बीएसपी का शेयर घटा है, संगठन कमजोर है और बीजेपी का हिंदुत्व नैरेटिव मजबूत। फिर भी, मायावती की यह आक्रामक शुरुआत अन्य दलों को मजबूर कर रही है। यदि ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित समीकरण कामयाब हुआ तो 2027 में यूपी की सियासत में बड़ा उलटफेर संभव है। मायावती की ये चालें साबित करती हैं कि बहुजन राजनीति अभी खत्म नहीं हुई।