मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते हमलों के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है। हाल ही में तेल के दाम में करीब 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। आशंका जताई जा रही है कि कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं, जिससे वैश्विक महंगाई बढ़ सकती है।
क्यों बढ़े तेल के दाम
तेल की कीमतों में तेजी की बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य है। यह मार्ग दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा रास्तों में से एक माना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल का लगभग 40 फीसदी हिस्सा और गैस का बड़ा भाग इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यहां बाधा आती है तो सप्लाई पर सीधा असर पड़ता है।
भारत की निर्भरता कितनी
भारत अपनी जरूरत का लगभग आधा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में मिडिल ईस्ट में अस्थिरता का असर भारत पर पड़ना स्वाभाविक है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि देश के पास पर्याप्त भंडार मौजूद है।
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45 दिनों का सुरक्षा कवच
सरकारी जानकारी के अनुसार, भारत के पास इतना कच्चा तेल भंडार में है कि आपूर्ति रुकने की स्थिति में करीब 45 दिनों तक काम चल सकता है। वहीं एलपीजी और एलएनजी का भंडार लगभग 15 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है। यह रणनीतिक तैयारी संभावित संकट को ध्यान में रखकर की गई है।
वैकल्पिक बाजारों की तैयारी
अधिकारियों का कहना है कि अगर जलडमरूमध्य में लंबे समय तक रुकावट आती है, तब भी भारत अन्य देशों से तेल खरीदने की क्षमता रखता है। अभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत करीब 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। फिलहाल आपूर्ति पर तात्कालिक असर नहीं दिख रहा है।
यूरोप में भी बढ़ी चिंता
मिडिल ईस्ट तनाव का असर यूरोप पर भी पड़ा है। वहां प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगभग 22 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर संघर्ष लंबा चला तो ऊर्जा बाजार में और उछाल आ सकता है। ऐसे में भारत की रणनीतिक तैयारी फिलहाल राहत देने वाली मानी जा रही है।