MLC Election Voting Process : देश के चार राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद यानी एमएलसी की सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं। इन चुनावों में कुल 28 सीटों पर मतदान कराया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में 11, बिहार में 8, महाराष्ट्र में 5 और कर्नाटक में 4 सीटें हैं। खास बात यह है कि इन चुनावों में ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जा रहा है। आमतौर पर विधानसभा चुनाव में मतदाता ईवीएम का बटन दबाकर अपना वोट देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि एमएलसी चुनाव में अलग व्यवस्था क्यों अपनाई जाती है? इसकी वजह समझने के लिए पहले विधान परिषद और उसके चुनाव का तरीका जानना जरूरी है।
क्या होती है विधान परिषद?
एमएलसी का पूरा नाम मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल है। हिंदी में इसे विधान परिषद सदस्य कहा जाता है। जिन राज्यों में विधान परिषद है, वहां यह राज्य विधानमंडल का दूसरा सदन होता है। जिस तरह संसद में लोकसभा और राज्यसभा हैं, उसी तरह इन राज्यों में विधानसभा के साथ विधान परिषद भी काम करती है। हालांकि, दोनों सदनों के सदस्यों को चुनने का तरीका अलग है। विधानसभा चुनाव में आम मतदाता अपने क्षेत्र के विधायक को चुनते हैं। वहीं विधान परिषद की सीटों के लिए अलग-अलग वर्गों के मतदाता वोट डालते हैं। कुछ सदस्य विधायकों, स्थानीय निकायों के निर्वाचित सदस्यों, स्नातकों और शिक्षकों के जरिए चुने जाते हैं, जबकि कुछ सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं।
एमएलसी चुनाव में कौन डालता है वोट?
विधान परिषद की सभी सीटों पर एक ही तरह से मतदान नहीं होता। कुछ सीटों पर विधायक वोट डालते हैं, तो कुछ पर स्थानीय निकायों के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं। स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों पर योग्य और पंजीकृत मतदाता वोट देते हैं। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में पात्र स्नातकों को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना होता है। इसी तरह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में तय शर्तें पूरी करने वाले शिक्षकों का नाम मतदाता सूची में शामिल होना जरूरी है। इसलिए इन चुनावों में पूरे राज्य के सभी आम मतदाता हिस्सा नहीं लेते। मतदान का अधिकार संबंधित निर्वाचन क्षेत्र और उसकी मतदाता सूची के नियमों के आधार पर तय होता है।
वोट डालने का तरीका भी है अलग
एमएलसी की कुछ सीटों पर मतदान के दौरान मतदाता केवल एक उम्मीदवार को चुनने के बजाय उम्मीदवारों की प्राथमिकता भी दर्ज करते हैं। इसे एकल संक्रमणीय मत यानी सिंगल ट्रांसफरेबल वोट प्रणाली कहा जाता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी सीट पर चार उम्मीदवार हैं, तो मतदाता अपनी पहली पसंद के सामने 1, दूसरी पसंद के सामने 2 और तीसरी पसंद के सामने 3 लिख सकता है। पहली पसंद दर्ज करना जरूरी होता है, जबकि आगे की पसंद दर्ज करना नियमों के अनुसार वैकल्पिक हो सकता है। इस व्यवस्था में मतदाता सिर्फ अपनी पसंद का उम्मीदवार नहीं चुनता, बल्कि जरूरत पड़ने पर वोट की अगली प्राथमिकता भी बताता है।
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वोटों की गिनती में क्या होता है?
इस व्यवस्था में जीत का फैसला तय नियमों के मुताबिक जरूरी मतों के कोटे से होता है। अगर पहली पसंद की गिनती में कोई उम्मीदवार जीत के लिए जरूरी कोटा हासिल कर लेता है, तो उसे विजेता घोषित किया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं होता, तो नियमों के अनुसार सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को बाहर किया जा सकता है। उसके मतपत्रों पर दर्ज अगली पसंद के आधार पर वोट दूसरे उम्मीदवारों को स्थानांतरित किए जाते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चल सकती है, जब तक कोई उम्मीदवार जरूरी कोटा हासिल न कर ले या लागू चुनावी नियमों के तहत नतीजा तय न हो जाए। इसलिए यहां वोटों की गिनती सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग हो सकती है।
EVM की जगह बैलेट पेपर क्यों?
इसका मुख्य कारण मतदान की मौजूदा व्यवस्था है। सामान्य ईवीएम में मतदाता एक उम्मीदवार के सामने लगा बटन दबाकर अपना वोट दर्ज करता है। जबकि प्राथमिकता आधारित मतदान में मतदाता को बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों के सामने अपनी पसंद का क्रम लिखना होता है। इसके बाद मतगणना में पहली पसंद और जरूरत पड़ने पर अगली पसंद को भी ध्यान में रखा जाता है। मौजूदा चुनावी व्यवस्था में इन सीटों के लिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में ऐसी प्रक्रिया के लिए तकनीक का इस्तेमाल असंभव है, बल्कि फिलहाल लागू व्यवस्था के तहत प्राथमिकता दर्ज करने और वोटों के हस्तांतरण की प्रक्रिया बैलेट पेपर के जरिए पूरी की जाती है।