साल 2006 में हुए मुंबई लोकल ट्रेन धमाकों के केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पेशल टाडा कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए सभी 12 लोगों को बरी कर दिया. इन 12 में से एक हैं मोहम्मद अली शेख, जो करीब 17 साल जेल में रहने के बाद अब रिहा होकर अपने घर, मुंबई के गोवंडी लौट आए हैं. रिहाई के बाद उन्होंने मीडिया से बात करते हुए अपने ऊपर लगे आरोपों को झूठा बताया और ATS पर गंभीर आरोप लगाए.
क्या कहा मोहम्मद अली शेख ने?
शेख ने कहा कि उन्हें जबरन फंसाया गया और उनसे सरकारी गवाह बनने का दबाव डाला गया. उन्होंने बताया, "ATS के अधिकारी मेरे घर आते थे, धमकाते थे और मेरे परिवार को परेशान करते थे. एक बार तो मेरे 11 साल के बेटे को भी थप्पड़ मारा गया. मुझे धमकी दी गई और कहा गया कि अगर मैं सरकारी गवाह बन जाऊं, तो मुझे 10 लाख रुपये, दुबई में नौकरी और हर महीने 10 हजार रुपये खर्च के लिए दिए जाएंगे. लेकिन मैंने यह ऑफर ठुकरा दिया क्योंकि मैं और मेरे साथ बाकी लोग निर्दोष थे."
हाईकोर्ट के फैसले से मिली राहत
21 जुलाई को बॉम्बे हाईकोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सभी आरोपियों की पेशी हुई, जिसमें उन्हें बरी करने का फैसला सुनाया गया. उसी शाम शेख को नागपुर जेल से रिहा किया गया और अगली सुबह वो मुंबई के लिए रवाना हुए.
जेल में मुश्किल भरे साल
शेख ने बताया कि जब वो ठाणे जेल में थे, उस दौरान उनके भाई मुनव्वर की मौत हो गई, लेकिन उन्हें पैरोल नहीं दी गई. कुछ समय बाद उनके पिता का भी निधन हो गया, तब पैरोल तो मिल गई, लेकिन पुलिस एस्कॉर्ट का खर्च 1 लाख 70 हजार रुपये मांगा गया, जो वे नहीं दे सके. इसलिए वो अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए.
पढ़ाई और नई शुरुआत की तैयारी
जेल में रहने के दौरान शेख ने अपनी पढ़ाई जारी रखी. उन्होंने टूरिज्म के दो कोर्स किए, आर्ट्स में ग्रेजुएशन पूरा किया और इतिहास में एमए की पहली साल की परीक्षा भी दी. अब वो पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने की योजना बना रहे हैं.
परिवार का छलका दर्द
शेख के एक रिश्तेदार ने कहा, "झूठे आरोपों ने हमारी छवि को नुकसान पहुंचाया. शेख को फंसाकर हमारे पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया गया." बता दें कि ATS ने दावा किया था कि एक पाकिस्तानी नागरिक शेख के घर आया था और वहीं बम बनाए गए थे, जो 11 जुलाई 2006 को ट्रेनों में लगाए गए. लेकिन कोर्ट ने इन दावों को खारिज कर दिया.
अब जब मोहम्मद अली शेख बरी हो चुके हैं, तो वो अपनी ज़िंदगी दोबारा शुरू करने की कोशिश में हैं, लेकिन उनके लिए यह रास्ता आसान नहीं होगा. उनका यह मामला एक बार फिर सवाल खड़ा करता है कि अगर कोई निर्दोष है, तो उसे न्याय मिलने में इतना लंबा वक्त क्यों लगता है?