भोपाल में आयोजित स्त्री शक्ति संवाद और सामाजिक सद्भाव बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने लव जिहाद और सामाजिक एकता को लेकर स्पष्ट और संतुलित विचार रखे। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम केवल कानून से नहीं, बल्कि परिवार, समाज और आपसी संवाद से संभव है। उनके संबोधन का केंद्र परिवार की भूमिका, महिला सुरक्षा और सामाजिक एकता रहा।
परिवार से शुरू होनी चाहिए रोकथाम की पहल
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि किसी भी समाज की नींव परिवार होता है। यदि घर के भीतर संवाद कमजोर होगा, तो बाहरी प्रभाव बच्चों और युवाओं को आसानी से प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर किन परिस्थितियों में परिवार की बेटियां बहकावे में आती हैं। इसके पीछे संवाद की कमी और पारिवारिक दूरी को उन्होंने प्रमुख कारण बताया।
महिलाएं समाज की सबसे मजबूत कड़ी
संघ प्रमुख ने महिलाओं को भारतीय संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ बताया। उन्होंने कहा कि समाज का चरित्र महिलाओं के संस्कार, सम्मान और सुरक्षा से तय होता है। जब महिलाएं सशक्त और सुरक्षित होती हैं, तभी परिवार और समाज मजबूत बनता है। इसी कारण महिला संवाद और सामाजिक चेतना बेहद जरूरी है।
कानून नहीं, सद्भावना जोड़ती है समाज को
डॉ. भागवत ने साफ कहा कि समाज को जोड़ने का काम केवल कानून नहीं कर सकता। आपसी विश्वास, संवाद और सहयोग ही समाज को एकजुट रखते हैं। उन्होंने कहा कि संकट के समय ही नहीं, सामान्य दिनों में भी मेल-जोल और सहयोग बनाए रखना सामाजिक सद्भाव का आधार है।
हिंदू समाज: विविधता में एकता का उदाहरण
हिंदू समाज की संरचना पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू कोई संज्ञा नहीं, बल्कि एक स्वभाव है। जातियां समाज के भीतर हैं और जब तक समाज संगठित है, तब तक पहचान सुरक्षित रहती है। उन्होंने शरीर के अंगों का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे हर अंग अलग कार्य करता है, वैसे ही समाज के सभी वर्ग मिलकर संतुलन बनाते हैं।
तीन स्तरों पर समाधान की जरूरत
संघ प्रमुख ने लव जिहाद जैसी घटनाओं की रोकथाम के लिए तीन स्तर बताए—
परिवार स्तर पर संवाद और विश्वास
समाज में संस्थाओं की सतर्कता और सक्रिय भूमिका
सामूहिक चेतना और प्रतिकार की भावना
उन्होंने कहा कि समाज को मूकदर्शक नहीं, बल्कि सजग और सक्रिय बनना होगा।
भ्रम फैलाने वाली सोच से सतर्क रहने की अपील
डॉ. भागवत ने कहा कि हजारों वर्षों से इस भूमि पर रहने वाले सभी लोगों की सांस्कृतिक जड़ें समान हैं। समाज को बांटने वाली सोच और भ्रम से सावधान रहने की आवश्यकता है। एकता ही समाज की सबसे बड़ी ताकत है।