राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पाकिस्तान के साथ संवाद को लेकर दिए गए दत्तात्रेय होसबोले के बयान का समर्थन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बातचीत की बात पाकिस्तान की सरकार से नहीं, बल्कि वहां के आम लोगों से संबंध बनाए रखने के संदर्भ में कही गई थी। भागवत ने यह भी दोहराया कि पाकिस्तान को लेकर संघ की कोई अलग विदेश नीति नहीं है और संगठन इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख के साथ खड़ा है।
होसबोले के बयान का किया बचाव
एक संवाद कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि पाकिस्तान में आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जो भारत के विभाजन को गलत मानते हैं और दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों की वकालत करते हैं। उनके मुताबिक, वहां का एक वर्ग दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध करता है और मानता है कि साथ रहना ज्यादा बेहतर विकल्प था।
'बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए'
भागवत ने कहा कि किसी भी परिस्थिति में संवाद के सभी रास्ते बंद कर देना समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में भारत को पाकिस्तान पर निर्णायक बढ़त हासिल करनी है, तो वहां के लोगों को शांति और स्थिरता की दिशा में साथ लेकर चलना होगा। इसके लिए बातचीत का एक विकल्प हमेशा खुला रहना चाहिए।
'हमारा स्वभाव दरवाजे बंद करने का नहीं'
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारतीय परंपरा और विचारधारा कभी भी सभी रास्ते बंद करने की पक्षधर नहीं रही है। उन्होंने कहा कि अन्याय और अत्याचार का विरोध जरूरी है, लेकिन समाज में जो सकारात्मक और अच्छा है, उसे भी बचाकर रखना चाहिए। इसी सोच के तहत संवाद की संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार की नीति के साथ खड़ा है संघ
मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के संबंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोई अलग विदेश नीति नहीं है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर संगठन पूरी तरह भारत सरकार की नीति और निर्णयों के अनुरूप चलता है। उनके बयान के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों और संवाद की संभावनाओं को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।