
विजयादशमी के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने राष्ट्र की सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता पर ज़ोर देते हुए एक स्पष्ट और दृढ़ संदेश दिया। नागपुर में आयोजित वार्षिक उत्सव में उन्होंने कहा कि हाल ही में कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में हुई घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश के सामने कौन मित्र है और कौन शत्रु। ऐसे समय में, जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी पहचान मज़बूत कर रहा है, हमें अपने चारों ओर फैले ख़तरों को पहचानते हुए, सतर्क और समर्थ बने रहना होगा।
देश की सीमाओं पर वैचारिक चुनौती
भागवत ने कहा कि देश के भीतर और सीमाओं पर मौजूद चुनौतियाँ केवल भौतिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि बाहरी दुश्मनों से लड़ने के लिए केवल सेना ही नहीं, बल्कि समाज का प्रत्येक वर्ग सजग और जागरूक होना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि "आज की दुनिया में शस्त्रों के साथ-साथ विचारों की भी लड़ाई चल रही है। हमें अपने राष्ट्र की अस्मिता, संस्कृति और मूल्यों की रक्षा दोनों स्तरों पर करनी है।"
संघ का राष्ट्र निर्माण में योगदान
अपने संबोधन में उन्होंने सामाजिक समरसता, आत्मनिर्भर भारत और सांस्कृतिक जागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत को न केवल सैन्य रूप से बल्कि आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक रूप से भी आत्मनिर्भर बनना होगा। "जब हम अपने इतिहास, अपनी जड़ों और अपनी शक्ति को पहचानते हैं, तभी हम सच्चे मायनों में सुरक्षित और सक्षम बनते हैं," उन्होंने कहा। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे आधुनिक तकनीक और शिक्षा को अपनाते हुए राष्ट्र निर्माण में योगदान दें। "समय आ गया है कि हम केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि सृजनकर्ता बनें। तभी भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।"
विजय का प्रतीक
अंत में मोहन भागवत ने विजयादशमी के प्रतीकात्मक महत्व की चर्चा करते हुए कहा कि यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, और हमें इसे केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि चेतना के रूप में अपनाना चाहिए। विजयादशमी का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है – जागरूक रहिए, संगठित रहिए और समर्थ बनिए।