अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों में Ali Khamenei की मौत के बाद ईरान की सत्ता में बड़ा बदलाव हुआ है। देश की सबसे शक्तिशाली धार्मिक संस्था Assembly of Experts ने उनके बेटे Mojtaba Khamenei को नया सर्वोच्च नेता चुन लिया है। युद्ध और उत्तराधिकार के संकट के बीच लिया गया यह फैसला ईरान की राजनीति में नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है।
असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स की वर्चुअल बैठक में फैसला
अमेरिका-इजरायल के हमलों के चलते हालात बेहद संवेदनशील बने हुए थे, जिसके कारण 88 सदस्यीय असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स की भौतिक बैठक संभव नहीं हो सकी। ऐसे में वर्चुअल मीटिंग के जरिए मोजतबा खामेनेई के नाम पर मुहर लगाई गई। इससे पहले अली खामेनेई की 28 फरवरी 2026 को हमलों में मौत के बाद तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद ने अस्थायी रूप से सत्ता संभाली थी।
IRGC के दबाव की चर्चा
सूत्रों के मुताबिक, Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने धार्मिक नेताओं पर मोजतबा के समर्थन में दबाव बनाया। IRGC ईरान की सबसे प्रभावशाली सैन्य और आर्थिक शक्ति मानी जाती है, जिसका राजनीति पर सीधा प्रभाव है। कहा जा रहा है कि युद्ध की स्थिति में स्थिरता बनाए रखने और सख्त नीतियों को जारी रखने के लिए यह कदम जरूरी बताया गया।
विवादों में घिरा उत्तराधिकार
ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रांति राजशाही को खत्म करने के लिए हुई थी। क्रांति के मूल सिद्धांतों में वंशवाद को अस्वीकार्य माना गया था। ऐसे में पिता के बाद बेटे का सर्वोच्च नेता बनना कई धार्मिक और राजनीतिक हलकों में विवाद का विषय बन गया है। इसे क्रांति की मूल भावना के विपरीत कदम बताया जा रहा है।
मोजतबा के सामने बड़ी चुनौती
करीब 56 वर्षीय मोजतबा लंबे समय से पर्दे के पीछे सक्रिय रहे हैं। हालांकि उनके पास अपने पिता जैसा ‘आयतुल्लाह’ का धार्मिक दर्जा नहीं है। उनकी ताकत IRGC और बसिज फोर्स से गहरे संबंधों को माना जाता है। ऐसे में उनकी वैधता और जनस्वीकार्यता सबसे बड़ी चुनौती होगी।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और भविष्य की राह
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फैसले को लेकर आलोचना की संभावना जताई जा रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इसे राजशाही जैसे वंशवादी कदम के रूप में देखा जा सकता है। युद्धग्रस्त माहौल में नया नेतृत्व ईरान को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर दुनिया की नजरें टिकी हैं।