वर्ष 2022 में पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे सूची से बाहर किया जाना वित्तीय प्रशासन में सुधार का संकेत माना गया था, लेकिन इस फैसले को लेकर बना शुरुआती उत्साह अब फीका पड़ता दिखाई दे रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी वित्तपोषण पर प्रभावी अंकुश अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ग्रे सूची से हटाने के बावजूद ‘फॉलो-अप मॉनिटरिंग’ में बनाए रखने का फैसला किया। एफएटीएफ ने यह कदम देश की मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक लगाने की क्षमता और इच्छाशक्ति को लेकर चिंताओं के चलते उठाया।
आतंकी वित्तपोषण से पूरी तरह सुरक्षित नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक, एफएटीएफ की अध्यक्ष एलिजा डी’ आंदा मद्राजो ने इस चेतावनी को स्पष्ट शब्दों में रखा। उन्होंने कहा कि ग्रे सूची से बाहर होना “आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ कोई अचूक ढाल नहीं” है। ग्रे सूची से बाहर होने वाले देशों की भी निरंतर समीक्षा की जाती है और पाकिस्तान के मामले में यह निगरानी एशिया-पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) द्वारा की जा रही है, क्योंकि पाकिस्तान एफएटीएफ का पूर्ण सदस्य नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी देश, जो ग्रे सूची से बाहर निकलता है, मनी लॉन्ड्रिंग या आतंकी वित्तपोषण से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाता।
देशभर में 300 से अधिक नए प्रशिक्षण शिविर
रिपोर्ट के अनुसार, यह चेतावनी केवल सैद्धांतिक नहीं थी। खुफिया सूचनाओं में सामने आया कि पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने घरेलू डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर लगभग 1.4 करोड़ अमेरिकी डॉलर जुटाए। इस धन का उपयोग कथित तौर पर देशभर में 300 से अधिक नए प्रशिक्षण शिविर बनाने के लिए किया जाना था। इस खुलासे ने इस आशंका को और मजबूत किया कि पाकिस्तान का वित्तीय तंत्र, विशेषकर डिजिटल और अनौपचारिक क्षेत्र, अब भी चरमपंथी नेटवर्क के दुरुपयोग के प्रति संवेदनशील है।