मध्यप्रदेश विधानसभा का पांच दिवसीय शीतकालीन सत्र आज से शुरू हो गया है, जहां सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक टकराहट देखने को मिल सकती है। विपक्ष ने पहले ही साफ कर दिया है कि वह सरकार को SIR अभियान में हुई कथित अनियमितताओं और मौतों, किसानों की बदहाली, महंगाई, बेरोजगारी सहित कई मुद्दों पर कटघरे में खड़ा करेगा। वहीं दूसरी ओर सरकार दो अहम विधेयक पेश करने की तैयारी में है, जिससे सत्र और गरमाने की संभावना है।
सत्र में दो अहम विधेयक रखे जाएंगे
शीतकालीन सत्र की शुरुआत के साथ ही सरकार नगर पालिका–नगर परिषद चुनाव से जुड़े विधेयक और दुकान एवं स्थापना (द्वितीय संशोधन) विधेयक पेश करेगी। माना जा रहा है कि इन विधेयकों पर भी विपक्ष सरकार से कई सवाल पूछने की तैयारी में है। सत्र पांच दिनों का है और कुल चार बैठकें होंगी, जिसमें कई महत्वपूर्ण निर्णयों की उम्मीद की जा रही है।
विपक्ष की रणनीति: SIR अभियान से लेकर किसान मुद्दों तक
सत्र की पूर्व संध्या पर विपक्ष ने अपने विधायकों के साथ विस्तृत रणनीति तैयार की। विपक्षी दल ने SIR अभियान में कथित अनियमितताओं, मौतों, कानून-व्यवस्था की गिरती स्थिति, दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौत, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य, स्मार्ट मीटर को लेकर बढ़ती नाराजगी और ओबीसी आरक्षण जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का फैसला किया है।
विधायकों का कहना है कि सरकार सत्र को छोटा रखकर गंभीर मुद्दों पर चर्चा से बचना चाहती है, जबकि जनता उनसे जवाब की उम्मीद कर रही है। विपक्ष ने सत्र के भीतर हर मुद्दे पर जोरदार तरीके से आवाज उठाने का संकल्प लिया है।
विधानसभा सचिवालय में रिकॉर्ड संख्या में प्रश्न
विधानसभा सचिवालय को अब तक कुल 1,497 प्रश्न प्राप्त हुए हैं, जिनमें 751 तारांकित और 746 अतारांकित प्रश्न शामिल हैं। इसके अलावा 194 ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, 6 स्थगन प्रस्ताव, 14 निजी सदस्य संकल्प, 52 शून्यकाल सूचनाएं और नियम 139 के तहत 2 सूचनाएं भी दी गई हैं। यह संख्या बताती है कि विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों की ओर से सत्र को लेकर गंभीरता है।
विपक्ष का आरोप— ‘अल्प अवधि जनता की आवाज दबाने की कोशिश’
कई विधायकों ने सत्र की छोटी अवधि पर नाराजगी जताई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि भ्रष्टाचार, किसान संकट, बढ़ती अत्याचार की घटनाओं और प्रशासनिक अनियमितताओं के बीच सरकार को लंबा सत्र रखना चाहिए था, ताकि विस्तृत चर्चा हो सके। उनका आरोप है कि सत्र छोटा रखकर जनता की आवाज को सीमित किया जा रहा है।