मध्यप्रदेश की आर्थिक स्थिति गंभीर होती जा रही है। राज्य पर कुल कर्ज 4.21 लाख करोड़ से ज्यादा पहुंच चुका है, जो कि उसके वार्षिक बजट से भी ज्यादा है। पेंशन, ब्याज और चुनावी घोषणाओं के बढ़ते बोझ ने सरकार की माली हालत बिगाड़ दी है। अब फिर से
सप्लीमेंट्री बजट की नौबत आ गई है।
बजट से ज्यादा है कर्ज, सरकार की हालत चिंताजनक
राज्य सरकार का 2025-26 का बजट 4,21,032 करोड़ रुपये है, लेकिन उस पर कुल कर्ज 4,21,740 करोड़ रुपये हो गया है। यानी कर्ज बजट से 708 करोड़ रुपये ज्यादा है। हाल ही में सरकार ने दो किश्तों में 4,500 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया है। लगातार बढ़ती उधारी राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रही है।
सबसे ज्यादा खर्च पेंशन और ब्याज भुगतान में
राज्य के बजट का 21% हिस्सा सिर्फ तीन मदों में खर्च हो रहा है—कर्ज की किस्तें, पेंशन और ब्याज भुगतान। अकेले पेंशन पर 2025-26 में 28,961 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यह खर्च पिछले 10 सालों में 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बढ़ गया है।
घोषणाएं जारी, आमदनी में नहीं बढ़ोतरी
एक ओर सरकार की आमदनी सीमित है, वहीं दूसरी ओर खर्च बढ़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री ने हाल ही में 'लाड़ली बहना' योजना के तहत बहनों को दीपावली से 1500 रुपये देने की घोषणा की है। इस घोषणा से हर बहना पर 250 रुपये प्रति माह अतिरिक्त खर्च आएगा, जो करोड़ों में पहुंचेगा। साथ ही, कर्मचारियों की पदोन्नति और वेतन वृद्धि का भी बड़ा असर बजट पर पड़ेगा।
घटते संसाधन, फिर भी विकास योजनाएं चालू रखने की कोशिश
सरकार ने अब विभागों से कहा है कि नई गाड़ियां या गैर-जरूरी खर्चों के लिए बजट नहीं मिलेगा। मौजूदा योजनाएं किसी तरह जारी रखी जाएं, इसके लिए सप्लीमेंट्री बजट की तैयारी की जा रही है। लेकिन ये स्पष्ट है कि बिना आय बढ़ाए सिर्फ घोषणाओं से राज्य की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है।
न्यू पेंशन स्कीम से मिल सकती है राहत
हालांकि 2005 के बाद भर्ती हुए कर्मचारियों पर पुरानी पेंशन योजना लागू नहीं होती, जिससे आने वाले वर्षों में पेंशन का बोझ कुछ हद तक कम हो सकता है। मगर फिलहाल की स्थिति यह है कि पेंशन और ब्याज के भुगतान के चलते राज्य के पास विकास कार्यों के लिए बजट की भारी कमी है।