मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव पिरझलार के किसानों ने वो कर दिखाया है जो अक्सर सरकार या प्रशासन से अपेक्षित होता है। खेतों तक जाने वाली कच्ची और कीचड़ भरी राह से परेशान इन किसानों ने बार-बार शिकायतें कीं, जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई, लेकिन जब हर तरफ से सिर्फ आश्वासन ही मिला, तो उन्होंने खुद अपनी समस्या का समाधान खोजा। गांव के 23 किसानों ने मिलकर 2 किलोमीटर लंबी सड़क अपने खर्चे पर बनवा दी। इसके लिए उन्होंने करीब ₹3.20 लाख रुपए आपस में इकट्ठा किए और जनसहयोग से निर्माण कार्य शुरू करवाया। अब यह रास्ता ट्रैक्टर, बाइक और पैदल आवाजाही के लिए पूरी तरह उपयुक्त हो गया है। किसानों की इस एकजुटता ने यह दिखा दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो रास्ता खुद बन जाता है—वो भी सच literal और रूपक दोनों में...
सालों
की परेशानी बनी थी समस्या
पिरझलार गांव के खेतों तक जाने वाला रास्ता लंबे समय से बदहाल था। खासकर बारिश के दिनों में कीचड़ और जलभराव के कारण ट्रैक्टर तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता था। किसान मनमोहन सिंह चावड़ा बताते हैं कि कई बार शासन-प्रशासन को शिकायत दी गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ वादे ही मिले।
खुद
के दम पर बनाई
2 किमी लंबी सड़क
थक-हारकर किसानों ने निर्णय लिया कि अब इंतजार नहीं करेंगे। 23 किसानों ने मिलकर आर्थिक सहयोग किया और ₹3.20 लाख रुपए जमा कर निर्माण कार्य शुरू कराया। बिना किसी सरकारी मदद के बनी यह सड़क अब खेतों तक पहुंचने का मुख्य मार्ग बन गई है, जिससे किसानों को काफी राहत मिल रही है।
जनसहयोग
बना मिसाल
यह पूरी पहल जनसहयोग से की गई, जिसमें गांव के हर किसान ने अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया। यह सिर्फ सड़क निर्माण नहीं था, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता और एकजुटता की मिसाल भी है। यह मॉडल उन ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रेरणा है, जहां प्रशासनिक उपेक्षा बनी रहती है।
अब सरकार से नहीं, खुद
से उम्मीद
इन किसानों का मानना है कि जब तक जनता खुद अपनी जरूरतों के लिए आगे नहीं आएगी, तब तक सिस्टम से बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल है। सड़क निर्माण के बाद अब खेतों तक फसल लाना, बीज पहुंचाना और अन्य कार्य आसान हो गया है। किसानों की इस कोशिश ने पूरे इलाके में एक नई सोच को जन्म दिया है।