मध्य प्रदेश की मेडिकल शिक्षा में अब सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि सेवा की भावना भी जुड़ेगी। साल 2026 से MBBS छात्रों को अब न सिर्फ क्लासरूम में बल्कि गांवों के बीच जाकर लोगों का इलाज करना होगा। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (National Medical Commission) की नई गाइडलाइन के अनुसार अब मेडिकल छात्र 'फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम' का हिस्सा होंगे, जिसमें उन्हें गांव में रहकर एक-एक परिवार को गोद लेना होगा और उनकी स्वास्थ्य देखभाल की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। यह पहल न केवल ग्रामीणों के लिए फायदेमंद होगी बल्कि मेडिकल छात्रों को व्यवहारिक अनुभव भी प्रदान करेगी।
अब गांव में जाकर करेंगे इलाज
मेडिकल शिक्षा विभाग की इस नई व्यवस्था के तहत MBBS छात्रों को कॉलेज से बाहर निकलकर सीधे ग्रामीण अंचलों में लोगों की सेवा करनी होगी। इसके लिए हर छात्र को कम से कम एक परिवार को गोद लेना अनिवार्य होगा। उन्हें उस परिवार के स्वास्थ्य की देखभाल, नियमित चेकअप और जरूरी इलाज की जिम्मेदारी लेनी होगी।
78 घंटे गांव में देना होगा समय
छात्रों को हर हफ्ते गांव में 78 घंटे तक सेवा देनी होगी। उन्हें ग्रामीणों के बीच रहकर उनके जीवन, सामाजिक परिस्थिति और स्वास्थ्य चुनौतियों को समझना होगा। इस दौरान उन्हें बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के विशेष इलाज पर फोकस करने को कहा गया है।
मेडिकल छात्रों को मिलेगा व्यवहारिक अनुभव
यह योजना सिर्फ ग्रामीणों के लिए लाभकारी नहीं है, बल्कि इसका सबसे बड़ा फायदा छात्रों को प्रैक्टिकल नॉलेज और मरीजों के व्यवहार को समझने का मौका मिलेगा। छात्रों को सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर हर वर्ग के मरीज से सीखने को मिलेगा।
तीन साल में 26 गांवों की विज़िट अनिवार्य
नई गाइडलाइन के मुताबिक:
दूसरे साल: 10 गांव
तीसरे साल: 7 गांव
छात्रों को इन गांवों में जाकर मेडिकल कैम्प लगाना होगा, प्राथमिक इलाज देना होगा, ज़रूरत पड़ने पर अस्पताल तक मरीजों को पहुंचाना भी उनकी जिम्मेदारी होगी।
स्वास्थ्य सेवाओं को मिलेगी नई दिशा
इस योजना से जहां ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा मजबूत होगी, वहीं मेडिकल छात्रों की संवेदनशीलता और सेवा भाव भी विकसित होगा। यह मॉडल आने वाले समय में पूरे देश के लिए उदाहरण बन सकता है।