डिजिटल घड़ियों और स्मार्टफोन के इस युग में भी मध्यप्रदेश के रतलाम जिले का एक गांव ऐसा है, जहां लोग वक्त जानने के लिए न मोबाइल देखते हैं, न घड़ी पहनते हैं... बल्कि ‘टन-टन’ की आवाज सुनते हैं। सेमेलिया गांव में आज भी 100 साल पुरानी परंपरा निभाई जा रही है, जहां एक पैलेस में लगे पेंडुलम घंटे की ध्वनि ही गांव वालों की दिनचर्या तय करती है।
100 साल पुराना है सेमेलिया पैलेस का 'घंटा'
रतलाम जिले के सेमेलिया गांव में स्थित एक भव्य पैलेस में मिश्रधातु से बना वह घंटा टंगा है, जिसे 100 साल पहले राठौर राजपरिवार के पूर्वजों ने स्थापित किया था। यह घंटा आज भी उतनी ही सटीकता से बजता है और गांववालों को हर घंटे समय की सूचना देता है।
‘घड़ी नहीं घंटा’ तय करता है जिंदगी की रफ्तार
सेमेलिया गांव में लोगों का सुबह उठना, चाय पीना, खेत जाना, मजदूरों की छुट्टी—all कुछ घंटे की आवाज पर आधारित है। जैसे ही 5 बजे सुबह 5 बार टन-टन होती है, लोग नींद से जाग उठते हैं। शाम 8 बजे के बाद यह घंटा नहीं बजता, यानी दिन का अंत।
राजपरिवार निभा रहा परंपरा, घंटा बना 'अलार्म'
सेमेलिया राठौर राजपरिवार के सदस्य गिरिराज सिंह आज भी इस परंपरा को पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। वे बताते हैं कि उनके ग्रेट ग्रैंडफादर ने इस घंटे की स्थापना की थी। गांव में आपातकाल या आपदा की सूचना देने के लिए भी इस घंटे का इस्तेमाल किया जाता है।
हर गांववाले की घड़ी बना यह घंटा
सेमेलिया गांव ही नहीं, आसपास के पांच गांवों में भी इस घंटे की टन-टन सुनाई देती है। इस घंटे को समय-समय पर बजाने के लिए एक कर्मचारी की ड्यूटी लगाई जाती है, जो पूरे दिन नियमित अंतराल पर इसे बजाता है। यह परंपरा न केवल विरासत है, बल्कि गांव के जीवन की धड़कन भी है।