मध्यप्रदेश में दो बच्चों के नियम को खत्म करने की तैयारी तेज हो गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के “तीन बच्चे भी अच्छे” वाले बयान के बाद सरकार इस नियम में बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। इससे उन 400 से अधिक शासकीय सेवकों को राहत मिलेगी, जिनकी नौकरी तीसरे बच्चे के कारण खतरे में थी। प्रस्ताव तैयार हो चुका है और जल्द ही इसे बदला जा सकता है, जिससे लाखों कर्मचारियों की चिंता दूर होगी।
आरएसएस प्रमुख के बयान से शुरू हुई नई बहस
मोहन भागवत ने हाल ही में कहा कि देश की जनसंख्या नीति के अनुरूप एक परिवार में तीन बच्चे होना बेहतर है। उनका सुझाव था कि हर परिवार स्थिर और स्वस्थ समाज के लिए तीन बच्चों पर विचार करे। उनके इस बयान के बाद एमपी में दो बच्चों की सीमा पर बने नियम को लेकर नई चर्चा गर्म हो गई।
तीसरे बच्चे वाले कर्मचारियों को बड़ी राहत
राज्य के 400 से अधिक सरकारी कर्मचारी तीसरे बच्चे के कारण जांच, कार्रवाई और नौकरी खोने के डर से जूझ रहे थे। कई को यह नियम पता भी नहीं था, जबकि कुछ मामलों में बच्चों की मृत्यु के बाद दूसरी संतान चाहने पर भी नियम आड़े आता रहा। नया प्रस्ताव लागू हुआ तो इन सभी कर्मचारियों को राहत मिल जाएगी।
2001 में लागू हुआ था दो बच्चे का नियम
साल 2001 में राज्य में जनसंख्या नियंत्रण को ध्यान में रखते हुए शासकीय सेवकों के लिए दो बच्चों से अधिक होने पर रोक लगा दी गई थी। तब से लेकर अब तक इस कानून ने कई कर्मचारियों को विवाद और मानसिक तनाव में डाला। विशेषकर कोरोना काल के दौरान कई ऐसे मामले सामने आए जिनमें नियम लागू होने के बावजूद समस्या बढ़ती गई।
शहरी क्षेत्रों में बढ़ रहा एक बच्चे का ट्रेंड
विदेशों की तरह एमपी के शहरों में एक बच्चे का चलन तेजी से बढ़ रहा है। महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य और जिम्मेदारियों के बोझ के कारण कई दंपत्ति केवल एक ही बच्चे को जन्म दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जनसंख्या घटने की प्रवृत्ति आने वाले समय में चिंता का विषय बन सकती है।
सरकार ने तैयार किया प्रस्ताव, जल्द हट सकती है बंदिश
सरकार दो बच्चों की सीमा से जुड़े नियम में संशोधन पर गंभीरता से विचार कर रही है। प्रस्ताव एक दौर की चर्चा पार कर चुका है और संकेत मिल रहे हैं कि जल्द ही इसे हटाया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो 12 लाख से अधिक शासकीय और संविदा कर्मचारी भविष्य में भी बिना कानूनी बाधा के बड़ा परिवार बना सकेंगे।