मध्य प्रदेश से जुड़े एक सिनेरियस गिद्ध ने अपनी लंबी उड़ान से वन्यजीव विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। रायसेन जिले के हलाली डैम क्षेत्र से मुक्त किए गए इस गिद्ध ने राजस्थान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को पार करते हुए उज्बेकिस्तान तक 3000 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय किया। जीपीएस ट्रैकिंग के जरिए सामने आई इस यात्रा को गिद्ध संरक्षण अभियान की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
घायल हालत में मिला था दुर्लभ गिद्ध
यह सिनेरियस गिद्ध कुछ समय पहले घायल अवस्था में मिला था। इसके बाद वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों ने उसकी लगातार निगरानी करते हुए इलाज शुरू किया। लंबे उपचार और देखभाल के बाद गिद्ध पूरी तरह स्वस्थ हो गया। अधिकारियों के मुताबिक, रिकवरी के दौरान उसकी गतिविधियों पर विशेष नजर रखी गई थी ताकि उसे दोबारा प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जा सके।
हलाली डैम से किया गया था मुक्त
23 फरवरी 2026 को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने रायसेन जिले के हलाली डैम क्षेत्र में इस गिद्ध को प्राकृतिक आवास में छोड़ा था। खुले वातावरण में आने के बाद यह करीब एक महीने तक हलाली क्षेत्र के आसपास सक्रिय रहा। इस दौरान उसने खुद को प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार ढालना शुरू किया और धीरे-धीरे लंबी उड़ानों के संकेत देने लगा।
जीपीएस ट्रैकिंग से सामने आई पूरी यात्रा
वन विभाग ने गिद्ध की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उसके शरीर में जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम लगाया था। ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, गिद्ध ने 10 अप्रैल को हलाली डैम से उड़ान भरी। इसके बाद उसने राजस्थान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रास्ते 4 मई को उज्बेकिस्तान तक का सफर तय किया। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस दौरान उसने 3000 किलोमीटर से अधिक दूरी तय की।
संरक्षण अभियान के लिए बड़ी सफलता
वन अधिकारियों का मानना है कि यह यात्रा मध्य प्रदेश में चल रहे गिद्ध संरक्षण अभियान की बड़ी सफलता है। गिद्धों की संख्या लगातार कम होने के बीच इस तरह का सफल पुनर्वास वन्यजीव संरक्षण के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ होने के बाद गिद्ध का इतनी लंबी दूरी तय करना उसकी प्राकृतिक क्षमता और अनुकूलन शक्ति को दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी चर्चा
इस अनोखी उड़ान के बाद मध्य प्रदेश के गिद्ध संरक्षण प्रयासों की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है। वन्यजीव विशेषज्ञ इसे वैज्ञानिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं। जीपीएस ट्रैकिंग से मिली जानकारी भविष्य में गिद्धों के माइग्रेशन पैटर्न और संरक्षण रणनीतियों को समझने में भी मदद करेगी।