मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में किसान पारंपरिक फसलों से हटकर अब अरबी (घुईंया) की खेती कर रहे हैं और इससे दोगुना मुनाफा कमा रहे हैं। अरबी की खासियत यह है कि इसका हर हिस्सा उपयोगी होता है—कंद से लेकर पत्तों तक। स्वाद, पोषण और बाजार मांग के चलते अरबी अब सिर्फ सब्जी नहीं, बल्कि आय का मजबूत जरिया बनती जा रही है। सही मौसम, मिट्टी और तकनीक अपनाकर किसान इस फसल से शानदार कमाई कर सकते हैं। आइए जानते हैं अरबी की खेती से जुड़ा पूरा गणित।
अरबी की खेती का मौसम और तापमान
अरबी की फसल को गर्म और नमी वाला मौसम चाहिए। इसका आदर्श तापमान 21 से 27 डिग्री सेल्सियस होता है। उत्तर भारत में इसकी रोपाई फरवरी-मार्च में जबकि अन्य जगहों पर जून-जुलाई में की जाती है। अधिक गर्मी या सूखा इसका विकास प्रभावित करता है।
मिट्टी और खेत की तैयारी
अरबी के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है। मिट्टी का pH स्तर 5.5 से 7.0 के बीच होना चाहिए। खेत की गहरी जुताई के बाद हल्की जुताई करें और 10 सेंटीमीटर ऊंची क्यारियां बनाएं। कंदों को 45 सेंटीमीटर की दूरी और 5 सेंटीमीटर गहराई में बोना चाहिए।
खाद और सिंचाई की सही तकनीक
बेहतर उत्पादन के लिए प्रति एकड़ 40-60 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद के साथ 16 किलो नाइट्रोजन, 25 किलो फॉस्फोरस और 25 किलो पोटाश का प्रयोग करें। हर 7-10 दिन में सिंचाई करें। बारिश न हो तो 15 दिन में पानी देना जरूरी है।
बीज उपचार और रोग नियंत्रण
कंदों को बोने से पहले 10-15 मिनट तक रिडोमिल एमजेड-72 में भिगोकर बीज उपचार करें। इससे फसल रोगमुक्त रहेगी और पैदावार में बढ़ोतरी होगी।
कमाई का गणित: पत्ते भी लाते हैं मुनाफा
अरबी की फसल को तैयार होने में 150-225 दिन लगते हैं। लेकिन कमाई की शुरुआत 40-50 दिन बाद पत्तों की कटाई से हो जाती है। पत्तों से साग, पकौड़ी जैसी देसी चीजें बनाई जाती हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग रहती है।