मध्य प्रदेश को दुनिया ‘टाइगर स्टेट’ के नाम से जानती है, लेकिन साल 2025 में यही पहचान सवालों के कटघरे में खड़ी हो गई है। जंगलों में बाघों की दहाड़ से ज्यादा उनकी मौतों की गूंज सुनाई दे रही है। एक के बाद एक हो रही रहस्यमयी मौतों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली, सुरक्षा तंत्र और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
2025 में बाघों पर मौत का साया
साल 2025 अभी पूरा भी नहीं हुआ, लेकिन मध्य प्रदेश में अब तक 54 बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी है। यह आंकड़ा न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि प्रोजेक्ट टाइगर के इतिहास में भी एक डरावनी मिसाल बन गया है। हालात इतने गंभीर हैं कि बीते एक हफ्ते में ही छह बाघों की जान चली गई, जिसने जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी।
बांधवगढ़ से आई ताजा चेतावनी
हाल ही में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के चंदिया फॉरेस्ट रेंज में एक बाघ का शव मिला। पावर लाइन के पास मिले इस शव को लेकर आशंका जताई जा रही है कि मौत करंट लगने से हुई। बाघों की गणना के दौरान सामने आई यह घटना बताती है कि जंगलों में खतरे खुलेआम मौजूद हैं।
आपसी लड़ाई या सिस्टम की नाकामी?
सरकारी रिकॉर्ड में अधिकतर मौतों को ‘आपसी संघर्ष’ बताया जा रहा है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। 2025 में हुई कुल मौतों में करीब 57 प्रतिशत मौतें अप्राकृतिक कारणों से जुड़ी हैं, जिनमें शिकार, करंट और संदिग्ध परिस्थितियां शामिल हैं। यह स्थिति वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
अंतरराष्ट्रीय शिकार नेटवर्क की आहट
वन्यजीव तस्करी से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की मौजूदगी भी चिंता बढ़ा रही है। हाल के महीनों में तस्करी से जुड़े बड़े नाम सामने आए हैं, जिससे साफ है कि बाघ सिर्फ जंगलों में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी निशाने पर हैं।
पर्यटन पर पाबंदी और बढ़ता विवाद
बाघों की सुरक्षा के नाम पर कोर एरिया में पर्यटकों के मोबाइल ले जाने पर रोक लगा दी गई है। वन विभाग इसे सुरक्षा कदम बता रहा है, जबकि जानकारों का मानना है कि इससे पारदर्शिता कम होगी और जंगल के भीतर होने वाली घटनाएं बाहर नहीं आ पाएंगी।
जांच में लापरवाही के आरोप
आंतरिक रिपोर्ट्स में यह बात सामने आ चुकी है कि कई मामलों में पोस्टमार्टम, फॉरेंसिक जांच और कानूनी कार्रवाई अधूरी रही। हर मौत को एक ही कारण बताकर फाइल बंद करना, व्यवस्था की गंभीर खामी को उजागर करता है।
अब जवाबदेही जरूरी
मध्य प्रदेश की पहचान सिर्फ बाघों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा से तय होगी। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ‘टाइगर स्टेट’ का तमगा सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा।