MQ-9 Sea Guardian Deal----ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिकी MQ-9 ड्रोन को लेकर कई सवाल उठे हैं। इसके बावजूद भारत ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स से दो MQ-9B Sea Guardian ड्रोन को लीज पर लेने का करार किया है। करीब 1,943 करोड़ रुपये की इस डील के तहत भारतीय नौसेना अगले 30 महीनों तक इन ड्रोन का इस्तेमाल करेगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जब युद्ध क्षेत्र में इनकी सुरक्षा को लेकर चर्चा हो रही है, तो भारत के लिए ये ड्रोन इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?
हिंद महासागर की निगरानी में अहम भूमिका
भारतीय नौसेना को हिंद महासागर के विशाल समुद्री क्षेत्र की निगरानी करनी होती है। समुद्री सुरक्षा, संदिग्ध गतिविधियों, तस्करी, समुद्री डकैती और दूसरे देशों की नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए लगातार निगरानी जरूरी है। ऐसे में MQ-9B Sea Guardian लंबी अवधि तक उड़ान भरकर समुद्री क्षेत्र की निगरानी करने में मदद कर सकता है।
30 घंटे तक लगातार उड़ान की क्षमता
MQ-9 साधारण ड्रोन नहीं, बल्कि बड़े रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम हैं। इन्हें जमीन पर मौजूद ऑपरेटर नियंत्रित करते हैं। इनकी खासियत लंबी दूरी और लंबे समय तक हवा में बने रहना है। हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस क्षमता के कारण ये लंबे मिशन में उपयोगी साबित होते हैं। Sea Guardian को विशेष रूप से समुद्री निगरानी और सुरक्षा अभियानों के लिए तैयार किया गया है।
पहले से चल रहा है भारतीय नौसेना का इस्तेमाल
भारतीय नौसेना वर्ष 2020 से लीज पर MQ-9B सिस्टम का इस्तेमाल कर रही है। मौजूदा लीज अवधि समाप्त होने के कारण दो नए Sea Guardian ड्रोन लीज पर लेने का फैसला किया गया है। भारत पहले ही अमेरिका से 31 MQ-9B ड्रोन खरीदने का समझौता कर चुका है। इनमें Sea Guardian नौसेना के लिए और Sky Guardian सेना व वायुसेना के लिए उपयोग किए जाने हैं।
ईरान में नुकसान के बावजूद भारत को क्यों भरोसा?
ईरान संघर्ष में MQ-9 ड्रोन के नुकसान की खबरों के बावजूद भारत के लिए इनका उपयोग अलग रणनीतिक जरूरतों से जुड़ा है। ड्रोन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि निगरानी मिशन के दौरान मानव पायलट सीधे खतरे में नहीं होता। भारतीय नौसेना के लिए लंबे समय तक समुद्री निगरानी बनाए रखना इन प्रणालियों की सबसे बड़ी उपयोगिता है।