
विनोद शर्मा। नोएडा
independence day special: 222 वर्ष पहले, 11 सितंबर 1803 को, दिल्ली की धरती पर एक ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। यह थी पटपड़गंज की लड़ाई, जो द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का हिस्सा थी। इस युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने मराठा और मुगल सेनाओं को परास्त कर दिल्ली पर कब्जा कर लिया। इस ऐतिहासिक घटना का एक मूक साक्षी आज भी नोएडा के गोल्फ कोर्स के पास खड़ा है—एक पत्थर का स्मारक (obelisk), जिस पर 11 सितंबर 1803 की तारीख अंकित है। यह स्मारक न केवल अंग्रेजों की दिल्ली में पहली बार एंट्री का साक्ष्य है, बल्कि भारत में औपनिवेशिक शासन की नींव का भी प्रतीक है।
स्मारक इतिहास का जीवंत दस्तावेज
नोएडा के गोल्फ कोर्स के निकट स्थित यह स्मारक ब्रिटिश सेना की जीत की स्मृति में बनाया गया था। जनरल जेरार्ड लेक के नेतृत्व में अंग्रेजों ने यमुना नदी के किनारे पटपड़गंज में मराठा सेना को हराया था। इस स्मारक पर अंकित तारीख 11 सितंबर 1803 उस युद्ध की गवाही देती है, जिसने दिल्ली को मराठा और मुगल प्रभाव से मुक्त कर ब्रिटिश अधीनता में ला दिया। यह स्मारक उस समय की सैन्य रणनीतियों, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और भारत के बदलते राजनीतिक परिदृश्य का एक ठोस प्रमाण है।
पटपड़गंज की लड़ाई एक निर्णायक मोड़
1803 में दिल्ली उस समय मराठा सरदार दौलतराव सिंधिया के नियंत्रण में थी, और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय नाममात्र के शासक थे। ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेज़ली ने मराठा शक्ति को कमजोर करने और भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए सहायक संधि की नीति अपनाई। बसीन की संधि (1802) ने मराठा सरदारों में फूट डाली, जिसका फायदा उठाकर अंग्रेजों ने दिल्ली पर हमला बोला।पटपड़गंज में यमुना नदी के किनारे नोएडा के मौजूदा छलेरा गांव से लेकर मयूर विहार के खाली क्षेत्र में लड़े गए इस युद्ध में ब्रिटिश सेना की संख्या भले ही मराठा-मुगल सेना से कम थी (लगभग 4,500 बनाम 17,000), लेकिन उनकी अनुशासित रणनीति और तोपखाने ने जीत सुनिश्चित की। युद्ध के बाद, 14 सितंबर 1803 को अंग्रेजों ने दिल्ली में प्रवेश किया, और 16 सितंबर को जनरल लेक ने औपचारिक रूप से शहर पर कब्जा कर लिया। शाह आलम द्वितीय को अंग्रेजों ने अपने संरक्षण में ले लिया, जिससे मुगल साम्राज्य का प्रतीकात्मक अंत हो गया।
स्मारक का महत्व
नोएडा का यह स्मारक केवल एक पत्थर का ढांचा नहीं है; यह उस युग की कहानी कहता है जब भारत में सत्ता का संतुलन बदल रहा था। यह स्मारक ब्रिटिश साम्राज्यवाद की महत्वाकांक्षा, मराठा शक्ति के पतन, और मुगल साम्राज्य की अंतिम सांसों का गवाह है। इसके शिलालेख और डिज़ाइन उस समय की ब्रिटिश वास्तुकला और स्मारक निर्माण की शैली को भी दर्शाते हैं।आज यह स्मारक नोएडा के शहरी परिदृश्य में गोल्फ कोर्स के अंदर खड़ा है, लेकिन इतिहास के प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए यह एक अनमोल धरोहर है। यह हमें उस दौर की याद दिलाता है जब दिल्ली, जो कभी मुगल साम्राज्य की शान थी, ब्रिटिश शासन की छाया में आ गई।
आज के संदर्भ में
222 साल बाद, यह स्मारक हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटने का अवसर देता है, जिन्होंने भारत के भविष्य को आकार दिया। यह न केवल एक युद्ध की कहानी है, बल्कि उस समय की सामाजिक, राजनीतिक, और सैन्य गतिशीलता को समझने का एक माध्यम भी है। नोएडा के गोल्फ कोर्स के पास खड़ा यह स्मारक दिल्ली-एनसीआर के निवासियों के लिए एक स्थानीय धरोहर है, जो शहरीकरण के बीच इतिहास को संजोए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।