नवरात्रि के पावन दिनों में देशभर में देवी मां के जयकारे गूंज रहे हैं। इस बीच बिहार के कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी धाम अपनी अनोखी परंपराओं और चमत्कारों के कारण चर्चा में है। 5वीं शताब्दी में निर्मित यह प्राचीन मंदिर न केवल अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां होने वाली रक्तहीन बलि और रंग बदलने वाले शिवलिंग की रहस्यमयी मान्यता भक्तों को अचंभित कर देती है। हर साल हजारों श्रद्धालु यहां देवी मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
5वीं शताब्दी का प्राचीन धाम
मां मुंडेश्वरी धाम बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर ब्लॉक के रामगढ़ पंचायत स्थित पंवरा पहाड़ी पर स्थित है। भभुआ मुख्यालय से लगभग 14 किलोमीटर दूर और पटना से करीब 200 किलोमीटर की दूरी पर यह मंदिर समुद्र तल से 600 फीट की ऊंचाई पर बना है। भक्त यहां सीढ़ियों या घुमावदार सड़क से पहुंचते हैं। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार यह भारत का सबसे पुराना देवी मंदिर है, जिसका निर्माण गुप्तकाल में हुआ था।
अनोखी रक्तहीन बलि की परंपरा
इस मंदिर की सबसे अनोखी प्रथा है रक्तहीन बलि। यहां बकरे की जान नहीं ली जाती, बल्कि विशेष मंत्रों से उसे कुछ समय के लिए बेहोश कर दिया जाता है। इसे ही बलि माना जाता है। कुछ ही देर बाद बकरा फिर से होश में आ जाता है। कहा जाता है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज तक बिना किसी बदलाव के निभाई जा रही है।
चंड-मुंड के वध की कथा
मान्यता है कि इसी स्थान पर मां दुर्गा ने चंड और मुंड नामक दो असुरों का वध किया था। पहले चंड का वध हुआ और फिर मुंड इस पहाड़ी पर छिपा, जहां देवी मां ने उसे परास्त किया। इसी कारण इस स्थान का नाम मां मुंडेश्वरी पड़ा और यहां देवी को विशेष शक्ति स्वरूप में पूजा जाता है।
रंग बदलने वाला शिवलिंग
मंदिर के गर्भगृह में पंचमुखी भगवान शिव का दुर्लभ शिवलिंग स्थापित है। कहा जाता है कि यह शिवलिंग दिन के अलग-अलग समय पर अपना रंग बदलता है—सुबह, दोपहर और शाम को इसका रंग अलग दिखाई देता है। यह रहस्य आज तक विज्ञान भी नहीं समझ पाया है।