सावन के पवित्र महीने में शिव भक्त भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना में जुटे हैं. इसी बीच कानपुर के बड़ा चौराहा स्थित शिवाला इलाके में बना कैलाश मंदिर लोगों की आस्था और रहस्य का केंद्र बना हुआ है. इस मंदिर में उत्तर भारत का सबसे विशाल सफेद संगमरमर का शिवलिंग स्थापित है, जिसे लेकर कई दिलचस्प मान्यताएं जुड़ी हुई हैं.
इतना बड़ा शिवलिंग मंदिर में कैसे आया?
इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई करीब 5 फीट और चौड़ाई 7 फीट है. खास बात ये है कि इस शिवलिंग को 4 फीट के छोटे दरवाजे से मंदिर के अंदर कैसे लाया गया, यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है. लोगों का मानना है कि जब कोई इस मंदिर में सच्चे मन से मन्नत मांगता है तो उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है.
शिवलिंग को लाने में आई बड़ी मुश्किल
कहा जाता है कि इस संगमरमर के शिवलिंग को बनाने के बाद जब उसे मंदिर लाया जा रहा था, तभी गंगा नदी में बाढ़ आ गई जिससे यह शिवलिंग करीब एक साल तक रास्ते में ही अटका रहा. जब शिवलिंग मंदिर तक पहुंचा, तो पता चला कि वह मंदिर के दरवाजे से कहीं ज्यादा बड़ा है. इसे देखकर मंदिर के संस्थापक गुरु प्रसाद शुक्ला बहुत निराश हो गए.
दरवाजे के बिना भीतर कैसे पहुंचा शिवलिंग?
गुरु प्रसाद ने शिव की आराधना शुरू कर दी. उन्होंने एक महीने तक अन्न-जल त्याग दिया. उसी समय कानपुर में शंकराचार्य का आगमन हुआ. उन्होंने मंदिर में हवन और पूजा करवाई. इसके बाद गुरु प्रसाद को एक सपना आया जिसमें उन्होंने देखा कि शिवलिंग अपने स्थान पर स्थापित हो गया है. अगली सुबह जब उन्होंने मंदिर के पट खोले, तो शिवलिंग चमत्कारी रूप से मंदिर के अंदर उसी जगह रखा मिला जहां उसे स्थापित करना था.
रावण बना भोलेनाथ का प्रहरी
इस मंदिर की एक और खासियत है यहां रावण का भी मंदिर है. रावण को यहां भोलेनाथ का प्रहरी माना जाता है. रावण का मंदिर साल में सिर्फ एक बार विजयदशमी के दिन थोड़ी देर के लिए खोला जाता है. पूजा के बाद इसे बंद कर दिया जाता है और फिर रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है.
श्रद्धा का केंद्र बना है कैलाश मंदिर
साल 1860 के आसपास बना यह मंदिर 165 साल पुराना है और यहां हर सोमवार को जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता है. सफेद संगमरमर से बने शिवलिंग की भव्यता और रहस्य, भक्तों की आस्था को और मजबूत बनाते हैं. कह सकते हैं कि यह सिर्फ एक मंदिर नहीं, आस्था, चमत्कार और परंपरा का जीवंत संगम है.