महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में होने जा रहे महानगर निगम चुनाव ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गृह क्षेत्र और संघ का मुख्यालय होने के बावजूद बीजेपी के लिए यह चुनाव आसान नहीं दिख रहा। सहयोगी एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बागी और पवार गुट की आक्रामक एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय ही नहीं, बल्कि बेहद जटिल बना दिया है।
नागपुर चुनाव क्यों बना हाई-प्रोफाइल मुकाबला
नागपुर सिर्फ एक नगर निगम नहीं, बल्कि सियासी प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। पिछले 15 वर्षों से बीजेपी यहां सत्ता में काबिज है और लगातार तीन बार निगम पर कब्जा जमा चुकी है। ऐसे में चौथी बार जीत दर्ज करना पार्टी के लिए साख का सवाल बन गया है। मुख्यमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े इस शहर में हार, राजनीतिक संदेश भी दे सकती है।
सीट बंटवारे ने बढ़ाई महायुति की मुश्किल
इस चुनाव में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना साथ मैदान में हैं, लेकिन तालमेल जमीन पर कमजोर नजर आ रहा है। बीजेपी ने जहां अधिकतर सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, वहीं शिवसेना को सीमित सीटें मिलने से उसके कई स्थानीय नेता नाराज हो गए। नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में शिवसेना से जुड़े चेहरे निर्दलीय प्रत्याशी बनकर चुनावी मैदान में उतर आए, जो सीधे तौर पर बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।
बागियों से बिगड़ता बीजेपी का गणित
बीजेपी ने इस बार सत्ता विरोधी माहौल को संतुलित करने के लिए कई पुराने पार्षदों के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया है। लेकिन टिकट कटने से नाराज नेता चुप नहीं बैठे। कुछ ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया तो कुछ अंदरखाने पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। इससे कई वार्डों में हिंदुत्व वोटों के बंटने का खतरा बढ़ गया है।
अजित पवार की एनसीपी से बदला समीकरण
महायुति सरकार में शामिल होने के बावजूद अजित पवार गुट की एनसीपी इस चुनाव में अलग राह पर है। बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारकर एनसीपी ने मुकाबले को और पेचीदा बना दिया है। पूर्व नगरसेवक और स्थानीय प्रभाव वाले चेहरे बीजेपी के पारंपरिक गढ़ों में चुनौती पेश कर रहे हैं, जिससे सीधे तौर पर सत्ताधारी दल का समीकरण बिगड़ता दिख रहा है।
पवार फैक्टर से कांग्रेस की बढ़ी चिंता
कांग्रेस ने नागपुर में ‘एकला चलो’ की रणनीति अपनाई है, लेकिन उसकी राह आसान नहीं है। शरद पवार गुट की एनसीपी ने जिन इलाकों में उम्मीदवार उतारे हैं, वहां कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। दलित, अल्पसंख्यक और मुस्लिम मतदाताओं पर कई दलों की नजर होने से कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान की आशंका है।
कई खिलाड़ी, एक मैदान
इसके अलावा मनसे, बसपा, AIMIM और अन्य छोटे दलों की मौजूदगी ने मुकाबले को और रोचक बना दिया है। हर वार्ड में बहुकोणीय संघर्ष तय है, जहां थोड़े से वोटों का फर्क भी नतीजे पलट सकता है।