2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति गर्म हो गई है। इसी बीच पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी जॉइन कर ली है। उन्होंने अखिलेश यादव की मौजूदगी में सपा की सदस्यता ली। उनके साथ कई पूर्व विधायक और नेता भी सपा में शामिल हुए। इसे चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक बदलाव माना जा रहा है। नसीमुद्दीन ने सपा में शामिल होते ही दावा किया कि 2027 में अखिलेश यादव की अगुवाई में सरकार बनेगी।
बसपा से कांग्रेस और अब सपा तक सफर
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने राजनीति की शुरुआत बसपा से की थी। वह मायावती के बेहद करीबी माने जाते थे और पार्टी में बड़ा मुस्लिम चेहरा थे। एक समय उनके पास कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी थी। लेकिन 2017 के बाद उनका बसपा से रिश्ता टूट गया। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस जॉइन की और पश्चिम यूपी में काम किया। अब करीब साढ़े तीन दशक बसपा और आठ साल कांग्रेस में बिताने के बाद वह सपा में आए हैं।
सपा में पहले से मजबूत मुस्लिम नेतृत्व
सपा में पहले से ही कई बड़े मुस्लिम नेता सक्रिय हैं। आजम खान, अफजाल अंसारी, सलीम शेरवानी, अताउर्रहमान, कमाल अख्तर और जियाउर्रहमान जैसे नेता अलग-अलग क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नसीमुद्दीन अपनी अलग पहचान कैसे बनाएंगे। खुद नसीमुद्दीन ने भी अपने समर्थकों से कहा कि पार्टी में आकर खुद को बड़ा न समझें और संगठन में मिलकर काम करें।
मुस्लिम वोट बैंक पहले से सपा के साथ
यूपी में करीब 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। पिछले चुनावों में मुस्लिम वोट बड़े पैमाने पर सपा के साथ गया है। 2022 और 2024 में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट सपा को मिले। ऐसे में नसीमुद्दीन की एंट्री से वोट प्रतिशत में बड़ा बदलाव होगा या नहीं, इस पर चर्चा चल रही है। माना जा रहा है कि उनका नेटवर्क बसपा के पुराने कैडर में असर डाल सकता है।
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क्या आजम खान का विकल्प बनेंगे?
आजम खान अभी भी सपा का बड़ा मुस्लिम चेहरा माने जाते हैं, भले ही वह कानूनी मामलों में घिरे हों। ऐसे में नसीमुद्दीन को उनका विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगा। हालांकि पश्चिम यूपी और बुंदेलखंड में उनकी पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। माना जा रहा है कि सपा उन्हें संगठन विस्तार और चुनावी रणनीति में भूमिका दे सकती है।
2027 से पहले सपा का बड़ा दांव
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि सपा ने 2027 को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया है। नसीमुद्दीन की एंट्री से बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश दिख रही है। लेकिन सपा में पहले से मौजूद मजबूत नेताओं के बीच वह कितनी जगह बना पाएंगे, यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल यूपी की सियासत में यह बदलाव चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है