राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों की प्रक्रिया शुरू होते ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर हलचल तेज हो गई है। राज्यसभा की 24 सीटों और बिहार व महाराष्ट्र में विधान परिषद की सीटों के लिए चुनावी तैयारियां चल रही हैं। इन चुनावों को केवल संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक ताकत दिखाने के अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है। इसी कारण सहयोगी दलों के बीच हिस्सेदारी को लेकर बातचीत और खींचतान दोनों जारी हैं।
बिहार में सीटों को लेकर बढ़ी चर्चा
बिहार में विधान परिषद की नौ सीटों और एक उपचुनाव पर सभी की नजरें टिकी हैं। मुख्यमंत्री के इस्तीफे से खाली हुई सीट जनता दल (यूनाइटेड) के खाते में जाना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि बाकी सीटों के बंटवारे को लेकर भारतीय जनता पार्टी और जेडीयू के बीच लगातार मंथन चल रहा है। दोनों दल अपने राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अधिक से अधिक हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं।
सहयोगी दलों की भी बढ़ी दावेदारी
बिहार में एनडीए के अन्य सहयोगी दल भी अपनी हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं। राष्ट्रीय लोक मोर्चा और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा जैसे दल विधान परिषद में प्रतिनिधित्व चाहते हैं। विभिन्न दलों के नेताओं द्वारा लगातार संवाद और बैठकों का दौर जारी है। इससे साफ है कि गठबंधन के भीतर हर दल आगामी चुनावों से पहले अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
महाराष्ट्र में महायुति के सामने चुनौती
महाराष्ट्र में विधान परिषद की 16 सीटों और एक उपचुनाव को लेकर महायुति के घटक दलों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अपने-अपने लिए अधिक सीटों की मांग कर रही हैं। सीटों के बंटवारे को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अंतिम फार्मूला अभी सामने नहीं आया है।
राज्यसभा की खाली हुई सीट को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं।
कर्नाटक में सहयोगी संतुलन की परीक्षा
कर्नाटक में राज्यसभा की चार सीटों पर चुनाव होना है, जहां विधानसभा में संख्या बल के आधार पर कांग्रेस को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। वहीं भाजपा के सामने यह फैसला महत्वपूर्ण है कि वह अपनी संभावित सीट स्वयं रखे या सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) को अवसर दे। कुल मिलाकर राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव एनडीए के भीतर राजनीतिक संतुलन, सहयोगियों की भूमिका और आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाने वाले हैं।