मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में एक ऐसा गांव है, जहां हर सुबह की शुरुआत होती है नीम की हरियाली से। यहां की गलियों से लेकर हर घर के सामने नीम के पेड़ आपको दिखाई देंगे। इस गांव का नाम है रूपखेड़ा, जिसे अब 'नीम वाला गांव' कहा जाने लगा है। करीब 25 साल पहले एक विचार के रूप में शुरू हुई इस परंपरा ने आज पूरे गांव की तस्वीर और तकदीर बदल दी है। हरियाली, स्वास्थ्य, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता का जीवंत उदाहरण बन चुका है यह गांव।
नीम के पेड़ों से बनी गांव की पहचान
रतलाम से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित रूपखेड़ा गांव की पहचान अब इसके हरियाली से होती है। गांव के हर रास्ते, हर घर के आगे और चारों ओर सिर्फ नीम के पेड़ दिखाई देते हैं। गांव में नीम के लगभग 200 से ज्यादा पेड़ हैं जो सालों से गांव की हर सांस को शुद्ध कर रहे हैं।
2001 से शुरू हुई परंपरा, युवाओं ने संभाली कमान
इस हरियाली की शुरुआत हुई थी साल 2001 में, जब गांव के बुजुर्गों ने पेड़ लगाने की जिम्मेदारी उठाई। उन्होंने गांव के युवाओं को प्रेरित किया और एक सामूहिक संकल्प लिया कि हर घर के आगे नीम का पेड़ लगाया जाएगा। धीरे-धीरे यह परंपरा गांव की आदत और अब पहचान बन चुकी है।
नीम ने बचाया गांव को सूखे और बीमारियों से
नीम के पेड़ों की वजह से गांव का तापमान आसपास के इलाकों से कम रहता है। गर्मी में भी यहां ठंडी हवा बहती है और वातावरण शुद्ध बना रहता है। कोरोना महामारी के दौरान जहां आसपास के गांवों में संक्रमण फैला, वहीं रूपखेड़ा में मरीज ना के बराबर थे। गांव के लोग इसका श्रेय नीम के पेड़ों और स्वच्छ वातावरण को देते हैं।
गांधीवादी सोच और आत्मनिर्भरता की मिसाल
रूपखेड़ा गांव सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक सोच और आत्मनिर्भरता के लिए भी जाना जाता है। यहां के बुजुर्ग गांधीजी की विचारधारा से प्रभावित हैं और गांव के युवाओं को भी उसी रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं। खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यह गांव मजबूत कदमों से आगे बढ़ रहा है।
आज देश के लिए एक प्रेरणा बना रूपखेड़ा
करीब दो दशक पहले की गई एक छोटी शुरुआत ने रूपखेड़ा को देशभर के गांवों के लिए एक प्रेरणा बना दिया है। यह गांव बताता है कि अगर सोच सही हो और संकल्प मजबूत हो, तो कोई भी गांव हरा-भरा, स्वस्थ और आत्मनिर्भर बन सकता है।