NEET परीक्षा विवाद के बाद शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब देश की बड़ी राजनीतिक घटनाओं में शामिल हो गया है। लगातार कई सप्ताह तक चले आंदोलन, विपक्ष के दबाव और परीक्षा प्रणाली पर उठे सवालों के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पिछले 12 वर्षों में केंद्र सरकार के कार्यकाल के दौरान किसी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा आंदोलन के दबाव में पहली बार हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम से शुरू हुआ अभियान अचानक राष्ट्रीय स्तर की चर्चा का विषय बन गया।
NEET विवाद से बढ़ा आंदोलन का दायरा
शुरुआत में यह मामला केवल परीक्षा प्रक्रिया और कथित अनियमितताओं तक सीमित माना जा रहा था, लेकिन समय बीतने के साथ यह व्यापक छात्र आंदोलन में बदल गया। जंतर-मंतर पर लगातार प्रदर्शन हुए, परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग उठी और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी इस अभियान का समर्थन किया। आंदोलन का केंद्र बिंदु केवल परीक्षा नहीं बल्कि जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग बन गया।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद बना CJP
बताए गए घटनाक्रम के अनुसार, 15 और 16 मई को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी चर्चा का विषय बनी। इसके बाद 16 मई को अभिजीत दिपके नाम के व्यक्ति ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम से एक मंच तैयार किया। शुरुआती दौर में इसे सोशल मीडिया अभियान माना गया, लेकिन कुछ ही दिनों में बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़ गए। बाद में NEET परीक्षा से जुड़े विवाद ने इस मंच को आंदोलन का रूप दे दिया।
6 जून से धरना, तीन प्रमुख मांगें सामने आईं
6 जून को CJP की ओर से दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहला बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया गया। प्रदर्शनकारियों ने तीन प्रमुख मांगें रखीं। पहली, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग। दूसरी, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार लागू किए जाएं। तीसरी, परीक्षा विवाद और मानसिक तनाव के कारण जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए। 20 जून से आंदोलन अनिश्चितकालीन धरने में बदल गया, जिससे इसका प्रभाव और बढ़ गया।
सामाजिक समर्थन मिलने से बढ़ा दबाव
आंदोलन को उस समय और मजबूती मिली जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में भूख हड़ताल शुरू की। इसके बाद यह मुद्दा केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा बल्कि राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया। लगातार विरोध प्रदर्शनों और बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच अंततः केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस घटनाक्रम ने यह संदेश भी दिया कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे अब देश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बना चुके हैं।