Balen Shah----नेपाल की राजनीति में युवा चेहरे के तौर पर तेजी से उभरे प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले करीब 150 दिन हो चुके हैं। कभी बदलाव और नई राजनीति की उम्मीद बने बालेन के सामने अब सरकार चलाने की क्षमता साबित करने की चुनौती है। संसद से दूरी, पार्टी के भीतर मतभेद, भारत-नेपाल सीमा से जुड़े विवाद और कुछ फैसलों पर जनता की नाराजगी ने उनकी शुरुआती लोकप्रियता को प्रभावित किया है।
मेयर से प्रधानमंत्री तक का सफर
बालेन शाह ने 27 मार्च 2026 को नेपाल के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली थी। इससे पहले वह काठमांडू के मेयर के तौर पर अपनी अलग पहचान बना चुके थे। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ रैपर के तौर पर भी उनकी लोकप्रियता रही है। मार्च में हुए चुनाव में उन्होंने चार बार प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली को उनके गढ़ झापा में हराया और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी RSP को बड़ी जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
युवाओं को बदलाव की थी उम्मीद
बालेन शाह के सत्ता में आने को नेपाल की राजनीति में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा गया। खासकर युवा मतदाताओं को उनसे पुराने राजनीतिक ढर्रे से अलग काम करने और सरकार में ज्यादा जवाबदेही लाने की उम्मीद थी। लेकिन सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद उनके सामने कई राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियां खड़ी हो गईं। अब लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता के साथ-साथ सरकार के कामकाज और फैसलों को लेकर भी चर्चा होने लगी है।
भारतीय सामान पर सख्ती से बढ़ी नाराजगी
अप्रैल में भारत से खुले बॉर्डर के जरिए नेपाल आने वाले सामान पर कस्टम नियम सख्त किए गए। इस फैसले का असर उन लोगों पर पड़ा जो दवाइयों, किराने और रोजमर्रा की जरूरतों के सामान के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर रहते हैं। इसके बाद सरकार को विरोध का सामना करना पड़ा। बढ़ती नाराजगी के बीच बालेन शाह सरकार को अपना यह फैसला वापस लेना पड़ा। इस घटनाक्रम ने सरकार के सामने जनता की जरूरतों और प्रशासनिक फैसलों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को सामने रखा।
भारत-नेपाल सीमा विवाद ने बढ़ाई मुश्किल
बालेन शाह सरकार के शुरुआती दौर में भारत-नेपाल सीमा से जुड़ा विवाद भी सामने आया। इस मुद्दे ने सरकार के लिए कूटनीतिक स्तर पर नई चुनौती खड़ी कर दी। दूसरी ओर संसद से दूरी और पार्टी के भीतर खींचतान जैसे मुद्दे भी उनकी सरकार के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के सामने सिर्फ सरकार चलाने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपनी पार्टी और जनता के बीच भरोसा बनाए रखना भी जरूरी है।
अब असली परीक्षा भरोसा वापस पाने की
करीब 150 दिनों के बाद बालेन शाह की राजनीति एक अहम मोड़ पर दिखाई दे रही है। जिस युवा नेता को Gen-Z आंदोलन और नई राजनीति की उम्मीद के तौर पर देखा गया था, अब उन्हें अपने फैसलों और सरकार के कामकाज के जरिए उस भरोसे को मजबूत करना होगा। आने वाले समय में संसद के साथ उनका तालमेल, पार्टी के भीतर स्थिति और जनता की प्रतिक्रिया यह तय करने में अहम होगी कि बालेन शाह की लोकप्रियता सिर्फ एक युवा राजनीतिक लहर थी या वह नेपाल की राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव छोड़ने में सफल होते हैं।