Nepal Glacier Flood : नेपाल में आई अचानक भीषण बाढ़ ने बड़े इलाके में भारी तबाही मचा दी है। पानी के तेज बहाव में सड़कें, पुल, इमारतें और कई बस्तियां प्रभावित हुई हैं। इस आपदा के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतनी भयावह बाढ़ आई कैसे। शुरुआती विशेषज्ञ विश्लेषण में इसके पीछे सामान्य बारिश या भूकंप के बजाय ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटकर नीचे गिरने की आशंका जताई गई है।
ग्लेशियर टूटने से बनी आफत
शुरुआती अध्ययन के मुताबिक लैंगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तर मुख पर करीब 5200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूट गया। बर्फ और चट्टानों का यह भारी मलबा लगभग 1200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा। इसके बाद बड़ी मात्रा में मलबा लेंडे खोला नदी में पहुंच गया और नदी का बहाव अचानक प्रभावित हो गया।
अस्थायी बांध टूटा तो आया सैलाब
ग्लेशियर से नीचे गिरे बर्फ, पत्थर और मलबे ने लेंडे खोला नदी को कुछ समय के लिए रोक दिया। इससे वहां एक अस्थायी बांध जैसी स्थिति बन गई। जब यह अवरोध टूटा तो पानी के साथ कीचड़, चट्टानें और मलबे की विशाल लहर नीचे की ओर तेजी से बढ़ी। यही अचानक आया बहाव आगे भोटेकोशी नदी में पहुंचा और तबाही का दायरा बढ़ता चला गया।
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30 मिनट में कई मीटर बढ़ा पानी
भोटेकोशी नदी तिब्बत से निकलकर नेपाल के रसुवा जिले से गुजरती है। तिमुरे के आसपास बाढ़ का तेज बहाव आगे बढ़ा और बाद में भोटेकोशी के जरिए त्रिशूली नदी तक पहुंच गया। इसके कारण निचले इलाकों में भी हालात बिगड़ गए। रिपोर्टों के मुताबिक त्रिशूली नदी में कुछ जगहों पर पानी का स्तर महज 30 मिनट में करीब 7 से 9 मीटर तक बढ़ गया।
भूकंप को लेकर अलग दावा
आपदा की वजह को लेकर नेपाल और चीन की ओर से सामने आई जानकारी में अंतर भी दिखाई दे रहा है। नेपाल में चीन के राजदूत झांग माओमिंग ने शुरुआती जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि नेपाली क्षेत्र में आए भूकंप से हिमस्खलन हुआ और उसके बाद भूस्खलन ने बाढ़ की स्थिति पैदा की। वहीं शुरुआती सैटेलाइट विश्लेषण में ग्लेशियर से जुड़े बर्फ और चट्टानों के खिसकने को प्रमुख कारण बताया गया है।
सैटेलाइट तस्वीरों से खुला राज
प्लैनेट लैब्स की पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों के शुरुआती विश्लेषण से भी रसुवागढ़ी सीमा क्षेत्र के आसपास बड़े पैमाने पर बर्फ और चट्टानों के खिसकने के संकेत मिले हैं। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, रसुवागढ़ी बॉर्डर क्रॉसिंग से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ के संकेत सामने आए। यानी पहाड़ से शुरू हुई एक घटना ने नदी के रास्ते कई इलाकों तक जलप्रलय पहुंचा दिया।