
नेपाल की राजनीति में उठापटक पर फिलहाल विराम लग गया है। लंबे संघर्ष और भारी उथल-पुथल के बाद अब देश की बागडोर अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के हाथों में है। शुक्रवार को उन्होंने सर्वसम्मति से अंतरिम पीएम पद की शपथ ली। छह महीने तक अंतरिम सरकार ही नेपाल का संचालन करेगी, इसके बाद संसदीय चुनाव होंगे। हालांकि सत्ता परिवर्तन के साथ ही नई सरकार के सामने पहली बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
हिंसा में 51 लोगों ने गंवाई जान
दरअसल, नेपाल में 4 सितंबर को हुई Gen-Z क्रांति के दौरान हुई हिंसा में 51 लोगों की जान चली गई थी और हजारों घायल हुए थे। यह आंदोलन भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ शुरू हुआ था, लेकिन पुलिस और सुरक्षाबलों की गोलीबारी ने इसे और भड़काया। अब जिन परिवारों ने इस आंदोलन में अपने अपनों को खोया है, वे न्याय और सम्मान की मांग लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। उनकी प्रमुख मांग है कि मारे गए लोगों को ‘शहीद’ घोषित किया जाए।
परिजनों की आंखों में आंसू और मांग में न्याय
काठमांडू के रिपोर्टर्स क्लब में शुक्रवार को बड़ी संख्या में मृतकों के परिजन एकजुट हुए। उनके हाथों में अपने प्रियजनों की तस्वीरें थीं और आंखों से आंसू बह रहे थे। वे बार-बार यही कह रहे थे कि उनके बेटे-बेटियों ने नेपाल के बेहतर भविष्य के लिए अपनी जान दी है। उदाहरण के तौर पर, 21 वर्षीय उमेश महत, जो कॉलेज छात्र और फुटबॉल स्टार बनने का सपना देख रहे थे, गोलीबारी में मारे गए। उनकी बहन का कहना है, “मेरे भाई ने नेपाल की बेहतरी के लिए अपनी जान दी, सरकार उन्हें शहीद का दर्जा दे और हमारे परिवार की मदद करे।” इसी तरह 19 वर्षीय रसिक की मौत ने उनके परिवार को गहरा सदमा दिया है। उनकी चाची ने भी मांग उठाई है कि उन्हें शहीद घोषित किया जाए और आर्थिक सहायता दी जाए।
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अंतरिम सरकार के लिए पहली बड़ी परीक्षा
अब सवाल यह है कि अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की इन मांगों पर क्या रुख अपनाती हैं। अभी-अभी सत्ता संभालने वाली कार्की के लिए यह एक बड़ी परीक्षा है। सूत्रों के मुताबिक, अगर सरकार ने परिजनों की मांग पूरी नहीं की तो आने वाले दिनों में नेपाल एक बार फिर नए प्रदर्शन की आंच में झुलस सकता है। Gen-Z क्रांति ने नेपाल की राजनीति को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। इसी आंदोलन की वजह से केपी शर्मा ओली को सत्ता से हटना पड़ा और आज नेपाल की कमान सुशीला कार्की के हाथों में आई है। ऐसे में अब लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अंतरिम सरकार शांति और स्थिरता कायम रख पाएगी या फिर एक नई आग भड़क उठेगी।
नेपाल का राजनीतिक सफर अभी आसान नहीं है। फिलहाल सत्ता का संक्रमण तो हो गया है, लेकिन शांति और न्याय की मांग को अनदेखा करना नई सरकार के लिए बेहद भारी पड़ सकता है।