
नेपाल इस वक्त भीषण राजनीतिक संकट और हिंसक प्रदर्शनों से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे की मांग को लेकर देशभर में छात्रों और युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा है। राजधानी काठमांडू समेत कई जिलों में हालात बेकाबू हैं। इसी बीच खबर आ रही है कि पीएम ओली इलाज के बहाने दुबई जा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें नेपाल से ले जाने के लिए निजी एयरलाइन हिमालय एयरलाइंस को स्टैंडबाय पर रखा गया है।
इस्तीफों की झड़ी और बेकाबू विरोध
वहीं सोमवार को शुरू हुआ छात्रों का प्रदर्शन मंगलवार को और हिंसक हो गया। गृहमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और कृषि मंत्री समेत 10 मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे केवल पीएम ओली के पद छोड़ने पर ही शांत होंगे। अब तक की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस फायरिंग में कम से कम 19 लोगों की मौत और 300 से ज्यादा घायल हुए हैं।
सरकार ने हालात संभालने के लिए सोशल मीडिया पर लगाए गए 26 प्लेटफॉर्म्स के प्रतिबंध हटा दिए, लेकिन तब तक गुस्से का ज्वालामुखी फट चुका था। प्रदर्शन अब सिर्फ सोशल मीडिया बैन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भ्रष्टाचार, बदइंतजामी और लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन के खिलाफ बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है।
नेताओं पर गुस्सा, घरों को फूंका
आंदोलनकारियों का गुस्सा नेताओं के घरों तक जा पहुंचा है। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के निजी आवास और नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के घर में आग लगा दी। सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल कांग्रेस के खिलाफ यह गुस्सा साफ करता है कि लोग पूरे राजनीतिक तंत्र से नाराज हैं। देउबा की संपत्ति और आधा दर्जन गाड़ियों को भी आग के हवाले कर दिया गया है। इसी बीच ओली की पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप-प्रधानमंत्री रघुवीर महासेठ के जनकपुर स्थित आवास पर भी पथराव हुआ।
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हवाई अड्डा हाई अलर्ट पर, पलायन की आशंका
वीआईपी यातायात के लिए त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (टीआईए) को हाई अलर्ट पर रखा गया है। कर्मचारियों को गुप्त निर्देश दिया गया है कि कुछ नेता हालात से बचने के लिए देश छोड़ने की कोशिश कर सकते हैं। माना जा रहा है कि पीएम ओली ने देश छोड़ने से पहले कार्यकारी जिम्मेदारियां अपने उप-प्रधानमंत्री को सौंप दी हैं।
संकट की जड़ और आगे का रास्ता
नेपाल में लोकतंत्र लागू होने के बाद से अब तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना पूरा कार्यकाल नहीं निभा पाया है। किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, और गठबंधन सरकारें बार-बार अस्थिर होती रही हैं। मौजूदा हालात ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि नेपाल में राजनीतिक स्थिरता अब भी दूर की बात है।
प्रदर्शनकारियों का संदेश साफ है कि वे अब सिर्फ आंशिक बदलाव नहीं चाहते, बल्कि पूरे शासन तंत्र में सुधार और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या पीएम ओली इस्तीफा देकर दबाव मानेंगे या फिर विदेश जाकर संकट से बचने की कोशिश करेंगे।