उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ सामाजिक समीकरणों की पुरानी बिसात पर नए मोहरे सजने लगे हैं। राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जयंत सिंह का 30 अगस्त को लखनऊ दौरा इसी बदलती राजनीतिक रणनीति का संकेत माना जा रहा है। गोमतीनगर स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में होने वाली संगठनात्मक बैठक भले ही बूथ स्तर पर पार्टी को मजबूत करने के लिए है, लेकिन इसके समानांतर ब्राह्मण और व्यापक सवर्ण समाज को आरएलडी से जोड़ने की कवायद इसे खास राजनीतिक अर्थ देती है।
आरएलडी के पदाधिकारियों के मुताबिक कार्यक्रम में ब्राह्मण समाज के साथ सवर्ण वर्ग के कई प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक चेहरे पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं। चौधरी चरण सिंह की किसान और सामाजिक न्याय की राजनीति को आधार बनाकर पार्टी जिस सामाजिक विस्तार की कोशिश कर रही है, उसका अगला पड़ाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बाहर निकलकर मध्य और पूर्वी यूपी में पैठ बनाना है। लखनऊ का आयोजन इसी विस्तार की प्रयोगशाला बन सकता है।
अखिलेश ने भी बदली रणनीति
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का हालिया रुख इस राजनीतिक बदलाव को और महत्वपूर्ण बनाता है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक आधार वाले पीडीए को अपनी चुनावी राजनीति का केंद्रीय सूत्र बनाने वाले अखिलेश अब उसके ‘पीडी’ में ‘पंडित’ भी तलाश रहे हैं। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में उनका यह कहना कि पीडीए में ‘पीडी’ का अर्थ पंडित है, महज शब्दों का प्रयोग नहीं माना जा सकता। यह उस सामाजिक वर्ग तक पहुंच बनाने की कोशिश है, जिसे सपा लंबे समय तक अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार से बाहर मानती रही।
ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर यह सक्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश में उनकी आबादी करीब 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है। कई विधानसभा क्षेत्रों में उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। पूर्वांचल के कुछ जिलों में यह हिस्सेदारी इससे भी अधिक बताई जाती है। हालांकि जातीय जनगणना के अभाव में इन आंकड़ों को अनुमान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
क्यों महत्वपूर्ण है ब्राह्मण फैक्टर
1990 के दशक में रामजन्मभूमि आंदोलन के बाद ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस से हटकर भाजपा के साथ गया। सांस्कृतिक मुद्दों के साथ राजनीतिक स्थिरता और नेतृत्व ने इस बदलाव को स्थायी आधार दिया। अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भाजपा का मजबूत आधार कायम है, लेकिन विपक्षी दलों की कोशिश है कि सवर्ण समाज में उसके एकाधिकार को किसी न किसी स्तर पर चुनौती दी जाए।
जयंत सिंह का लखनऊ दौरा इसी व्यापक प्रतिस्पर्धा की कड़ी है। आरएलडी अभी प्रदेशव्यापी चुनावी ताकत नहीं है, इसलिए उसके लिए सामाजिक विस्तार संगठनात्मक मजबूती जितना ही जरूरी है। दूसरी ओर अखिलेश का पंडितों की ओर संकेत बताता है कि 2027 की लड़ाई केवल पीडीए बनाम भाजपा नहीं रहने वाली। इसमें उन सामाजिक समूहों को साधने की होड़ भी होगी, जो कई सीटों पर जीत-हार का अंतर तय करने की क्षमता रखते हैं।