भोपाल। राजधानी में हर महीने सैकड़ों निकाह होते हैं, जिनमें दो परिवारों के बीच नए रिश्तों की डोर बंधती है। लेकिन इन्हीं निकाहों को संपन्न कराने वाले काजी खुद आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। पुराने रियासतकालीन नियमों के चलते काजियों को मात्र 375 रुपए का नजराना तय किया गया है, जो अब उनके लिए बोझ बन गया है।
आने-जाने में ही खत्म हो जाता है नजराना
शहर में करीब 60 काजी सक्रिय हैं, जो हर माह लगभग 500 से ज्यादा निकाह कराते हैं। इनमें से कई काजी बताते हैं कि जो नजराना उन्हें दिया जाता है, वह आने-जाने के खर्च में ही खत्म हो जाता है। कुछ काजियों ने तो आर्थिक तंगी के कारण यह सेवा छोड़ने तक का फैसला कर लिया है।
मसाजिद कमेटी का नया नियम बढ़ा रहा परेशानी
हाल ही में मसाजिद कमेटी ने नया फरमान जारी किया है, जिसके तहत काजियों को नजराना राशि प्राप्त करने के लिए बैंक खाता खुलवाना होगा। यह व्यवस्था पुराने रियासतकालीन दौर की परंपरा पर आधारित है, जो आज के समय में व्यावहारिक नहीं लगती। काजियों का कहना है कि समय के साथ इस राशि में बढ़ोतरी जरूरी है।
अन्य जिलों में अलग व्यवस्था, भोपाल में अब भी पुरानी परंपरा
मध्य प्रदेश के अन्य जिलों में निकाह की फीस कमेटियों द्वारा तय की जाती है और काजी की सहमति से नजराना दिया जाता है। लेकिन भोपाल में अब भी रियासतकालीन व्यवस्था लागू है। यहां काजी को 375 और नायब को 125 रुपए मिलते हैं, जबकि बढ़ाकर 700 और 300 रुपए करने की मांग की जा रही है।
रियासतकालीन परंपरा ने किया परेशान
काजियों का कहना है कि निकाह समाज की सबसे पवित्र रस्मों में से एक है, परंतु उनके मेहनताने को लेकर कोई सुनवाई नहीं होती। उनका मानना है कि परंपरा का सम्मान करते हुए भी समय की जरूरत के हिसाब से बदलाव जरूरी है, ताकि निकाह के इस पवित्र कार्य में जुड़े हर व्यक्ति को उसका उचित सम्मान और पारिश्रमिक मिल सके।