नीरव मोदी को लंदन की अदालत से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने ऋण वसूली मामले में बैंक ऑफ इंडिया के पक्ष में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने नीरव मोदी को 1.07 करोड़ डॉलर यानी 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम चुकाने का आदेश दिया है। यह मामला उनकी दुबई स्थित कंपनी के लिए ली गई क्रेडिट सुविधा से जुड़ा है।
2013 में दी थी निजी गारंटी
बैंक ऑफ इंडिया ने जुलाई 2012 में फायरस्टार समूह की दुबई स्थित कंपनी फायरस्टार डायमंड एफजेडई को कर्ज दिया था। अगस्त 2013 में नीरव मोदी ने निजी गारंटी पर हस्ताक्षर किए थे। इस गारंटी के तहत कंपनी के कर्ज नहीं चुकाने की स्थिति में नीरव मोदी को व्यक्तिगत तौर पर रकम लौटानी थी। बाद में कंपनी ने भुगतान नहीं किया तो बैंक ने गारंटी लागू करने की प्रक्रिया शुरू की।
2018 के ईमेल ने बदली पूरी कहानी
नीरव मोदी ने कोर्ट में कहा कि उन्हें बैंक की मांग और गारंटी लागू होने की उचित जानकारी नहीं दी गई थी। लेकिन 17 फरवरी 2018 का उनका पुराना ईमेल इस दलील के खिलाफ गया। ईमेल में उन्होंने लिखा था कि पंजाब नेशनल बैंक मामले के बाद उनके कारोबार पर गंभीर असर पड़ा है और उनकी कंपनियों का काम लगभग रुक गया है। कोर्ट ने इसे इस बात का संकेत माना कि उन्हें वित्तीय स्थिति और बैंकों की देनदारियों की जानकारी थी।
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नोटिस का जवाब नहीं देने का आरोप
पंजाब नेशनल बैंक घोटाला सामने आने के बाद बैंक ऑफ इंडिया ने मार्च और अप्रैल 2018 में नीरव मोदी और उनकी कंपनी को भुगतान के लिए नोटिस भेजे थे। रिपोर्ट के मुताबिक इन नोटिसों का कोई जवाब नहीं दिया गया। इसी आधार पर बैंक ने लंदन की अदालत में वसूली का मामला आगे बढ़ाया।
जज ने क्यों खारिज की दलील
मामले की सुनवाई कर रहे जज साइमन टिंकलर ने नीरव मोदी की नोटिस न मिलने वाली दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट के सामने रखे गए ईमेल और कर्ज से जुड़े दस्तावेजों से यह बात सामने आई कि नीरव मोदी अपनी कंपनी की वित्तीय परेशानी से परिचित थे। इसलिए निजी गारंटी से बचने की उनकी कोशिश सफल नहीं हो सकी।
आगे क्या हो सकता है
यह फैसला केवल कर्ज वसूली के इस अलग मामले से जुड़ा है। नीरव मोदी के खिलाफ भारत में पंजाब नेशनल बैंक धोखाधड़ी मामले समेत कई कानूनी प्रक्रियाएं पहले से चल रही हैं। बैंक ऑफ इंडिया अब अदालत के आदेश के आधार पर रकम की वसूली के लिए आगे की कानूनी कार्रवाई कर सकता है।