बिहार में नीतीश कुमार ने एक बार फिर इतिहास रचते हुए 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पटना के गांधी मैदान में हुए भव्य समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और कई राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद रहे। नीतीश के साथ सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जबकि कुल 27 मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। कार्यक्रम के दौरान दो दृश्य खूब चर्चा में रहे—पहला प्रधानमंत्री मोदी का गमछा लहराकर लोगों का अभिवादन करना, और दूसरा कई मंत्रियों का एक साथ सामूहिक शपथ लेना। सामूहिक शपथ की वजह से कई मंत्रियों की आवाज स्पष्ट नहीं सुनाई दी, जिसे लेकर सवाल उठे।
जातीय समीकरण पर खास ध्यान
नई कैबिनेट में जातीय संतुलन को सावधानी से साधा गया है। कुल 27 मंत्रियों में सामान्य वर्ग के 8, पिछड़ी जातियों से 9, अति पिछड़ी जातियों से 3 और दलित समुदाय से 5 मंत्री शामिल किए गए हैं। राजपूत और दलित दोनों ही वर्गों से सर्वाधिक मंत्री बनाए गए हैं, जबकि यादव समुदाय को भी दो मंत्रियों के माध्यम से प्रतिनिधित्व मिला है। जेडीयू कोटे से एक मुस्लिम मंत्री का शामिल होना भी राजनीतिक संदेश देता है। यह स्पष्ट है कि नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल में हर वोट बैंक को साधने की कोशिश की है, जिससे सत्ता का सामाजिक संतुलन मजबूत बना रहे।
परिवारवाद पर नई बहस
कैबिनेट गठन के बाद परिवारवाद का मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को बिना चुनाव लड़े ही मंत्री बनाया जाना सुर्खियों का बड़ा कारण बना। खुद उपेंद्र राज्यसभा सांसद, पत्नी विधायक और अब बेटा मंत्री—इस पूरे राजनीतिक समीकरण ने विपक्ष को हमला करने का मौका दिया है। इसी तरह जीतनराम मांझी का परिवार भी वर्षों से सत्ता संरचना में सक्रिय रहा है। विपक्ष ने डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और श्रेयसी सिंह जैसे नेताओं को भी परिवारवाद का प्रतीक बताया है। हालांकि, इसी बीच नीतीश कुमार के बेटे निशांत की एक झलक भी चर्चा में रही, जो राजनीति से दूर रहकर दर्शक दीर्घा में शांत बैठे दिखाई दिए। बिहार की राजनीति में सत्ता, जाति और परिवारवाद का मेल एक बार फिर पूरी तरह सामने है।