आज नया फोन खरीदते समय सबसे पहले जो लाइन दिखती है, वो होती है नो कॉस्ट ईएमआई या सिर्फ इतनी रकम महीना। यही लाइन लाखों लोगों को तुरंत खरीद के लिए मजबूर कर देती है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हों या मॉल, हर जगह यही ऑफर सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। फोन महंगा लगे तो ईएमआई चुन ली, बिना यह सोचे कि कुल मिलाकर कितना पैसा जा रहा है। यही से एक ऐसा चक्र शुरू होता है, जिससे निकलना आसान नहीं होता।
अपग्रेड ट्रैप क्या है और क्यों फंस रहे लोग
पहले लोग फोन खरीदकर तीन चार साल तक इस्तेमाल करते थे। अब वही फोन छह से बारह महीने में बदल दिया जाता है। वजह सिर्फ नई तकनीक नहीं, बल्कि आसान ईएमआई है। पुराना फोन एक्सचेंज करो, नई किश्त शुरू करो और नया मॉडल ले आओ। कई लोग ऐसे हैं जो लगातार फोन बदलते हुए सालों से ईएमआई भर रहे हैं। उन्हें लगता है कि बोझ कम है, लेकिन असल में खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है।
नो कॉस्ट ईएमआई नाम की चालाकी
नो कॉस्ट ईएमआई सुनने में बहुत अच्छी लगती है, लेकिन हकीकत अलग होती है। अगर वही फोन आप पूरा पैसा देकर खरीदें, तो कई बार सीधा डिस्काउंट मिल सकता है। ईएमआई चुनते ही वह छूट गायब हो जाती है। ऊपर से प्रोसेसिंग फीस, टैक्स और शर्तें जुड़ जाती हैं, जो पहली नजर में साफ नहीं दिखतीं। नतीजा यह होता है कि बिना ब्याज के नाम पर आप ज्यादा भुगतान कर बैठते हैं।
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एक्सचेंज ऑफर भी पूरा खेल का हिस्सा
पुराना फोन दो और इतने हजार का फायदा लो, यह ऑफर भी लोगों को जल्दी फैसला लेने पर मजबूर करता है। लेकिन कई बार पुराने फोन की असली कीमत उतनी नहीं होती, जितनी दिखाई जाती है। बाकी रकम बोनस के नाम पर ईएमआई प्लान में जोड़ दी जाती है। इससे नई किश्त और आकर्षक लगती है, लेकिन कुल खर्च बढ़ जाता है। एक्सचेंज और ईएमआई मिलकर अपग्रेड ट्रैप को और मजबूत बना देते हैं।
आंकड़े क्या बता रहे हैं यूजर्स की आदत पर
रिपोर्ट्स बताती हैं कि अब लगभग आधे स्मार्टफोन किश्त या क्रेडिट विकल्प पर खरीदे जा रहे हैं। कुछ साल पहले के मुकाबले यह आंकड़ा काफी तेजी से बढ़ा है। फोन बदलने का औसत समय भी घट गया है। पहले लोग ढाई से तीन साल फोन रखते थे, अब छह से बारह महीने में नया मॉडल ले लिया जाता है। वजह साफ है, मंथली किश्त छोटी लगती है, लेकिन कुल खर्च पर ध्यान नहीं जाता।
किश्त चूकी तो असर दूर तक जाएगा
ईएमआई अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन बिना पूरी कीमत समझे लेना नुकसानदेह हो सकता है। अगर एक दो किश्त भी छूट गई, तो लेट फीस लगती है और क्रेडिट स्कोर खराब होता है। इसका असर आगे मिलने वाले लोन और कार्ड पर पड़ता है। असली सवाल यही है कि हम फोन खरीद रहे हैं या हर साल नई किश्तों का बोझ। जवाब आपकी आदत और समझदारी में छुपा है।