नोएडा में घरेलू कामगारों का विरोध प्रदर्शन केवल वेतन बढ़ोतरी का नहीं बल्कि सम्मान और अधिकारों की मांग बन गया है। मेड्स के इस विरोध ने अमेरिकन और यूरोपियन क्लचर की तुलना मेंे भारत की मौजूदा श्रम व्यवस्था में कार्य स्थिति, सैलरी, सुविधाएं और अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। वेतन बढ़ोतरी के बावजूद मेड्स में असंतोष दिखाता है कि समस्या अब पैसों की नहीं है पर मुख्यता कार्य व्यवस्था की है। आइए जानते हैं इस बहस का पूरा मुद्दा।
नोएडा में विरोध
भारत में घरेलू कामगार मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र का हिस्सा हैं। मंगलवार को नोएडा के सेक्टर-121 सहित कई हाई-राइज़ हाउसिंग सोसायटीज़ में घरेलू सहायिकाओं ने वेतन बढ़ाने की मांग की। इस विरोध प्रदर्शन में मेड्स सड़क पर उतर आईं और कई जगहों पर काम बंद कर दिया। वहीं कुछ जगहों पर झड़प और पत्थरबाजी की घटनाएं भी देखने को मिली। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि इसे नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।
असंतोष का मुख्य कारण
वेतन बढ़ोतरी के बावजूद भी कामगारों में असंतोष है। घरेलू सहायिकाओं का कहना है कि बढ़ती महंगाई के हिसाब से वेतन अभी भी कम है और कई जगह न्यूनतम वेतन का पालन भी नहीं होता। साथ ही भारतीय श्रम व्यवस्था में काम के घंटे और जिम्मेदारी तय नहीं हैं, छुट्टियों और सामाजिक सुरक्षा (जैसे पीएफ और ईएसआई) की भी कमी है। पश्चिमी देशों की तरह किसी भी प्रकार का कोई औपचारिक या लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं है। इस वजह से नौकरी में सुरक्षा नहीं है जिसके चलते कभी भी काम से हटाया जा सकता है।
भारत में नई बहस
पश्चिमी देशों में घरेलू कामगारों की प्रोफेशनल स्थिति से तुलना के कारण भारत में श्रम व्यवस्था को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई। अब मुद्दा वेतन बढ़ोतरी से आगे बढ़कर सम्मान, सुरक्षा और स्थिरता पर आ गया है। नोएडा की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि भारत में घरेलू कामगारों के लिए एक स्पष्ट कानूनी ढांचा और बेहतर कार्य व्यवस्था की जरूरत है। सैलेरी के साथ साथ ही इस क्षेत्र में महिला कामगारों की संख्या अधिक होने के कारण यह मुद्दा महिला श्रम अधिकारों से भी जुड़ता है।
यूरोप-अमेरिका क्लचर
अमेरिका और यूरोप में घरेलू कामगारों की स्थिती भारत से बिल्कुल अलग है। वहां मेड्स को औपचारिक श्रमिक (प्रोफेशनल) और लक्जरी माना जाता है और न्यूनतम वेतन कानून के अतिरिक्त अन्य कई सुविधाएं भी मिलती हैं।
1. लक्जरी और न्यूनतम वेतन - पश्चिमी देशों में मेड या हाउसकीपर को लक्जरी माना जाता है क्योंकि वहां लेबर कॉस्ट ज्यादा होने के कारण हर कोई मेड नहीं रख सकता। एक प्रोफेशनल नैनी (हाउसकीपर) की औसत सैलरी $25 से $50 प्रति घंटा (भारतीय करंसी के मुताबिक करीब 2000 से 4000 रुपये) तक होती है। न्यूयॉर्क जैसे शहरों में एक अनुभवी मेड सालाना $70,000 से $1,00,000 (करीब 60 से 85 लाख रुपये सालाना) तक कमाती हैं।
2. वर्क-लाइफ बैलेंस - यूरोप और अमेरिका में मेड की छुट्टियां और वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर कानून बहुत सख्त हैं। वहां मेड को वर्कर माना जाता है जिसके अनुसार उन्हें सैलेरी और सुविधाए भी दी जाती हैं। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों में इन हैल्पर्स के काम के घंटे (लगभग 8 घंटे) तय हैं। अगर मेड 5 बजे तय घंटों के बाद काम करती है तो उन्हें ओवरटाइम देना अनिवार्य है।
3 . पेड लीव और पर्क - इन देशों में घरेलू कामगारों को साल में 20 से 30 दिन की तय पेड़ लीव मिलती है। 'राइट टू डिस्कनेक्ट' के अधिकार के अतिरिक्त उन्हें हेल्थ इंश्योरेंस भी मिलता है। इस अधिकार के तहत काम हो जाने और तय समय खत्म होने के बाद मालिक उन्हें फोन नहीं कर सकता। साथ ही अमेरिका में सार्वजनिक परिवहन न होने की वजह से अधिकांश मेड्स अपनी पुरानी या बेसिक कार से काम पर आती हैं। ऐसे में कई अमीर परिवार उन्हें कार अलाउंस या गैस के पैसे भी देते हैं।
4. प्रोफेशनलिज्म - विदेशों में श्रम कानून के तहत मेड्स साइन्ड कॉन्ट्रैक्ट के बेसिस पर काम करती हैं। उन्हें बच्चों की देखभाल या बुजुर्गों की सेवा के लिए एक विशेष सर्टिफिकेट आवश्यक होते हैं जिससे उनकी सैलरी और बढ़ जाती है।
5. सम्मान - इन देशों के कानून में हाउसहैल्पर्स के लिए 'डिग्निटी ऑफ लेबर' है। इसके कारण मेड और मालिक एक साथ एक ही टेबल पर बैठकर खाना खा सकते है। इसलिए अमेरिका और यूरोप में मेड्स को सूट-बूट या फॉर्मल कपड़ों में देखना सामान्य बात है।
6. महंगाई - अमेरिका और यूरोप जैसे पश्चिमी देशों में भले ही मेड महीने में 5 लाख रुपये कमाती हों पर वहां महंगाई के बोझ के कारण यह काफी कम है। इन देशों में एक साधारण घर का किराया ही 1.5 से 2 लाख रुपये होता है जो काफी महंगा है। ऐसे में मेड्स को खुद ही अपना बीमा, टैक्स और छोटे खर्च भी उठाने पड़ते हैं। हालांकि भारत में मेड का खाना, कपड़े या दवा के खर्चे अक्सर मालिक उठाते हैं।
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