हिमाचल की वादियों में एक ऐसा किला है, जो सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि दर्द, जलन और आत्मा की बेचैनी की कहानियां अपने भीतर समेटे हुए है। यह है नूरपुर किला, जहां की दीवारें आज भी नर्तकी नूरी की कराहें सुनती हैं। कहा जाता है कि उसकी सुंदरता और कला से जलकर मुगल बेगम नूरजहां ने उसकी जीभ कटवा दी थी। तब से लेकर आज तक, नूरी की आत्मा किले में भटक रही है और रात में वहां जाना मना है। आइए जानें इस रहस्यमयी किले की वह दास्तान जो आपको अंदर तक हिला देगी।
नूरपुर किला – इतिहास और खूबसूरती का संगम
16वीं शताब्दी के अंत में पठानकोट के राजा बसु देव ने इस किले का निर्माण कराया था। बाद में यह मुगलों और सिख राजाओं के अधीन रहा। पहले इसका नाम धामड़ी किला था, लेकिन जब नूरजहां पहली बार यहां आईं तो इसकी सुंदरता से मोहित होकर शहर का नाम ही बदलकर नूरपुर कर दिया गया।
नूरजहां को पसंद था ये किला, पर नहीं सह सकीं नूरी की सुंदरता
नूरजहां को यह किला इतना पसंद था कि वह यहीं बस जाना चाहती थीं। मगर जब उन्हें लगा कि नर्तकी नूरी की सुंदरता और गायन-नृत्य की कला कहीं उनकी लोकप्रियता को चुनौती न दे दे, तो उनका दिल ईर्ष्या से भर गया। नूरी के पायल की रुनझुन पूरे इलाके में लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती थी।
ईर्ष्या की पराकाष्ठा – कटवा दी नूरी की जीभ
नूरी का नृत्य और गायन देखकर जहांगीर का आकर्षण उसकी ओर बढ़ सकता है – इस आशंका ने नूरजहां को भीतर तक झकझोर दिया। अपनी राजनीतिक और निजी ताकत का इस्तेमाल करते हुए, नूरी की जीभ कटवा दी गई, ताकि वह फिर कभी न गा सके। उस दिन के बाद न केवल नूरी का जीवन खत्म हो गया, बल्कि इस किले की रौनक भी हमेशा के लिए बुझ गई।
रात में सुनाई देती है पायल की आवाज, भटकती है आत्मा
स्थानीय लोगों के मुताबिक, नूरी की आत्मा आज भी इस किले में भटकती है। रात में अगर कोई इस किले की ओर चला जाए तो घुंघरू की आवाज और दर्द भरी सिसकियां सुनाई देती हैं। इसलिए शाम ढलने के बाद नूरपुर किले में प्रवेश करना मना है।
किला आज भी खामोश है, मगर कहानियों से जिंदा
भले ही अब यह किला इतिहास का हिस्सा है, लेकिन इसकी दीवारों में नूरी की कला, दर्द और अन्याय की गूंज आज भी बाकी है। नूरजहां की जलन और नूरी का दुःख इस किले को आज भी एक भूतिया रहस्य बना कर रखे हुए हैं।