बनारस की गलियों में हर सुबह स्वाद का जो सिलसिला 'चाची की कचौड़ी' और 'पहलवान की लस्सी' से शुरू होता था, अब उसकी महक सिर्फ यादों में रह जाएगी. सुगम यातायात और चौड़ीकरण परियोजना के तहत लंका रविदास गेट चौराहे पर स्थित 35 से अधिक दुकानों पर प्रशासन ने बुलडोजर चला दिया. इनमें काशी की दो सबसे मशहूर दुकानों 'चाची की कचौड़ी ' और ' पहलवान की लस्सी' को भी गिरा दिया गया.
मिट गई बरसों पुरानी विरासत
रात 10:30 बजे जैसे ही पीडब्ल्यूडी का बुलडोजर चौराहे पर पहुंचा, वहां लोगों की भीड़ लग गई. हर कोई हैरान और भावुक था. एक-एक कर सभी दुकानें जमींदोज की जाती रहीं और पुलिस व PAC की भारी तैनाती के बीच यह कार्रवाई देर रात तक चलती रही.
जहां कभी सुबह-सुबह चाची की गरमा-गरम कचौड़ियों की खुशबू और पहलवान के लस्सी की मिठास से माहौल गुलजार होता था, वहीं अब सिर्फ मलबा और खामोशी नजर आ रही है.
अब कहां खाएंगे कचौड़ी-लस्सी?
रात के अंधेरे में जब दुकानों पर बुलडोजर चला, तो राहगीरों की जुबान पर एक ही सवाल था कि अब कहां खाइब चाची की कचौड़ी? पहलवान के लस्सी अब कहां भेंटाई?
काशी की विरासत की पहचान थीं दुकानें
बनारस की यह गली, जो सुबह की पहली किरण के साथ खाने-पीने के शौकीनों से भर जाती थी, अब सुनी हो गई है. चाची की कचौड़ी और पहलवान की लस्सी न सिर्फ खाने का जरिया थीं, बल्कि काशी की संस्कृति, विरासत और पहचान भी थीं.
प्रशासन ने दी दलील
प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई लंका- रामलीला मैदान चौराहे के चौड़ीकरण और ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए की गई है. बताया गया कि इन दुकानों को काफी पहले से नोटिस जारी किए गए थे और वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार चल रहा है.
हालांकि, स्थानीय लोगों और व्यापारियों का कहना है कि इन प्रतिष्ठानों को हटाने से सिर्फ रोजगार का नुकसान नहीं हुआ बल्कि काशी की परंपरा पर भी चोट पहुंची है.
क्या अब दोबारा कहीं शुरू होंगी ये दुकानें?
'चाची की कचौड़ी' और 'पहलवान की लस्सी' को अब किसी नई जगह से फिर से शुरू करने की उम्मीद जताई जा रही है. हालांकि अभी तक इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. दुकानदारों का कहना है कि वो बनारस की पहचान को जिंदा रखने के लिए फिर से शुरुआत करेंगे लेकिन कब और कहां, ये फिलहाल तय नहीं है.
वाराणसी में हो रहे विकास कार्यों और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार की दिशा में यह कदम भले ही प्रशासन के लिए जरूरी हो, लेकिन इसकी क़ीमत काशी के स्वाद, स्मृति और सांस्कृतिक धरोहर को चुकानी पड़ी है. चाची की कचौड़ी और पहलवान की लस्सी अब सिर्फ किस्सों और यादों में रह जाएंगे.