मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने OBC आरक्षण को लेकर एक बेहद अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है। कोर्ट ने क्रीमीलेयर की पात्रता को लेकर कहा है कि किसी महिला अभ्यर्थी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का निर्धारण उसके पति के आधार पर नहीं किया जा सकता। आरक्षण का लाभ पाने के लिए केवल माता-पिता की स्थिति ही मान्य होगी, जिससे भविष्य के कई मामलों पर सीधा असर पड़ेगा।
क्या है हाईकोर्ट का बड़ा फैसला?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने OBC क्रीमीलेयर को लेकर साफ कर दिया है कि महिला अभ्यर्थी के लिए पति की आय या पद को आधार नहीं बनाया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि क्रीमीलेयर का निर्धारण अभ्यर्थी के जन्म से जुड़ी सामाजिक और पारिवारिक स्थिति पर आधारित होता है। यानी माता-पिता की आर्थिक और सामाजिक स्थिति ही इसका मुख्य पैमाना होगी।
महिला अभ्यर्थियों को मिली बड़ी राहत
इस फैसले से खास तौर पर महिला उम्मीदवारों को राहत मिली है। अक्सर शादी के बाद पति की आय के कारण महिलाओं को क्रीमीलेयर में डाल दिया जाता था, जिससे उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता था। अब कोर्ट के इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि विवाह के बाद की स्थिति आरक्षण तय करने में प्रभावी नहीं होगी।
किस मामले में आया फैसला?
यह निर्णय सहायक प्राध्यापक (लॉ) पद पर हुई नियुक्ति से जुड़े एक विवाद में आया। याचिकाकर्ता ने चयनित उम्मीदवार की नियुक्ति को चुनौती देते हुए दावा किया था कि वह क्रीमीलेयर में आती हैं क्योंकि उनके पति उच्च पद पर कार्यरत हैं। याचिका में नियुक्ति रद्द करने और खुद को वरिष्ठता के साथ नियुक्त करने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि चयनित उम्मीदवार के पिता सरकारी सेवा में निम्न वर्ग के कर्मचारी थे और माता गृहिणी थीं। ऐसे में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्रीमीलेयर के दायरे में नहीं आती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की आय को इसमें जोड़ना नियमों के खिलाफ है, इसलिए याचिका को खारिज कर दिया गया।
OBC आरक्षण विवाद पर पड़ेगा असर
प्रदेश में OBC आरक्षण को लेकर पहले से कानूनी विवाद चल रहा है। ऐसे में यह फैसला भविष्य के मामलों के लिए एक मिसाल बनेगा। इससे क्रीमीलेयर की परिभाषा और ज्यादा स्पष्ट हो गई है और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता आने की उम्मीद है।