Vande Mataram Circular: केंद्रीय गृह मंत्रालय के ‘वंदे मातरम’ से जुड़े सर्कुलर पर जमीअत उलमा-ए-हिंद ने चिंता जताई है। संगठन के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत कोई पाठ करने के लिए बाध्य करना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है। उन्होंने अनुच्छेद 25 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए इस विषय पर पुनर्विचार की मांग की।
संवैधानिक अधिकारों का हवाला
मौलाना कासमी ने कहा कि संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में यदि किसी पाठ को अनिवार्य बनाया जाता है, तो यह व्यक्तिगत आस्था से जुड़े अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि किसी भी निर्णय में संवैधानिक प्रावधानों को प्राथमिकता दी जाए।
इबादत का प्रश्न
उन्होंने कहा कि इस्लाम एकेश्वरवाद के सिद्धांत पर आधारित है और मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत करते हैं। उनके अनुसार, यदि किसी रचना के कुछ अंश धार्मिक प्रतीकों या वंदना से जुड़े हों, तो उसे अनिवार्य करना आस्था के स्तर पर आपत्ति का कारण बन सकता है।
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विरोध नहीं
जमीअत ने स्पष्ट किया कि उसे ‘वंदे मातरम’ के पाठ से आपत्ति नहीं है, यदि कोई स्वेच्छा से इसे पढ़ना चाहता है। लेकिन इसे सभी नागरिकों या विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में प्रश्न खड़े कर सकता है।
संतुलन की अपील
मौलाना कासमी ने कहा कि देशप्रेम हर नागरिक का कर्तव्य है और मुस्लिम समुदाय भी अपने वतन से प्रेम करता है। साथ ही उन्होंने जोर दिया कि राष्ट्रीय एकता का आधार विविधता और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान है। उन्होंने संबंधित सर्कुलर की समीक्षा कर सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की।