जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो भारत पर इसका सीधा असर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदता है, इसलिए तेल महंगा होते ही खर्च बढ़ जाता है। इसका असर धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगता है और रुपये पर दबाव बनना शुरू हो जाता है।
डॉलर की मांग कैसे बढ़ाती है समस्या
तेल खरीदने के लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। जब तेल महंगा होता है, तो ज्यादा डॉलर की जरूरत होती है। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ जाती है। जब किसी चीज की मांग बढ़ती है, तो उसकी कीमत भी बढ़ती है। ऐसे में डॉलर मजबूत होता है और रुपये की कीमत गिरने लगती है।
करंट अकाउंट घाटा क्यों बढ़ता है
जब देश ज्यादा पैसा आयात पर खर्च करता है और कम कमाता है, तो घाटा बढ़ता है। इसे करंट अकाउंट घाटा कहा जाता है। तेल की कीमत बढ़ने से यह घाटा और बढ़ जाता है। इससे दुनिया के निवेशकों को लगता है कि भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है, जिससे रुपये की साख गिरने लगती है।
ये भी पढ़ें : 31 March तक बढ़ी समय सीमा, क्या अब बढ़ेगी सैलरी और पेंशन में बड़ा बदलाव
महंगाई कैसे बढ़ाती है मुश्किलें
तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से हर चीज की कीमत बढ़ जाती है। खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सब महंगा हो जाता है। इससे आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ता है और आर्थिक दबाव और बढ़ जाता है।
विदेशी निवेशक क्यों निकालते हैं पैसा
जब रुपये की कीमत गिरती है और महंगाई बढ़ती है, तो विदेशी निवेशक डर जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनका पैसा सुरक्षित नहीं रहेगा। ऐसे में वे अपना निवेश निकालकर दूसरे देशों में ले जाते हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग और बढ़ जाती है और रुपया और कमजोर हो जाता है।
रिजर्व बैंक कैसे संभालता है हालात
ऐसे समय में भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप करता है। वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर बाजार को संतुलित करने की कोशिश करता है। इससे रुपये की गिरावट कुछ हद तक रुकती है। हालांकि यह स्थायी समाधान नहीं है, लेकिन इससे स्थिति को कुछ समय के लिए संभाला जा सकता है।