नृत्य एक, अंदाज चार : कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्य की ऐसी शैली है, जिसमें कहानी, भाव, लय और पैरों की थाप का सुंदर मेल देखने को मिलता है. कथक की प्रस्तुति अलग-अलग क्षेत्रों और गुरु-परंपराओं के कारण कई रूपों में विकसित हुई. इन्हीं प्रमुख परंपराओं को घराना कहा जाता है. घराना केवल नृत्य की शैली नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा और वर्षों की साधना से बनी एक विशिष्ट पहचान है.
चार प्रमुख घराने
कथक के चार प्रमुख घराने माने जाते हैं—लखनऊ, जयपुर, बनारस और रायगढ़। हर घराने की अपनी खासियत है.
लखनऊ घराना: भाव और नजाकत
लखनऊ घराने में भाव-भंगिमा, अभिनय और नजाकत को विशेष महत्व दिया जाता है. इसमें हाथों की कोमल मुद्राएं, चेहरे के भाव और कहानी कहने की कला दर्शकों को आकर्षित करती है। इस परंपरा पर दरबारी संस्कृति का भी प्रभाव माना जाता है.
जयपुर घराना: दमदार लय और पैरों की थाप
जयपुर घराना अपनी तेज और जटिल लयकारी, मजबूत पदचाप और घूमरों के लिए जाना जाता है. इसमें ताल और तकनीकी कौशल पर विशेष जोर रहता है। नर्तक की पैरों की गति और ताल पर पकड़ इस शैली की बड़ी पहचान है.
बनारस घराना: सरलता में खास अंदाज
बनारस घराने में अपनी अलग ताल-पद्धतियों, भाव और पारंपरिक प्रस्तुतियों की छाप दिखाई देती है। इसकी शैली में सहजता के साथ धार्मिक और लोक-सांस्कृतिक प्रभाव भी नजर आता है.
रायगढ़ घराना: प्रयोग और नएपन की मिसाल
रायगढ़ घराने का विकास अपेक्षाकृत आधुनिक दौर में हुआ. इसमें कथक को नई रचनाओं, तालों और प्रयोगों से समृद्ध करने पर जोर दिया गया। यही वजह है कि इसे कथक में नवाचार की महत्वपूर्ण परंपरा माना जाता है.
अलग तेवर, एक ही विरासत
चारों घरानों की तकनीक और प्रस्तुति भले अलग हो, लेकिन सभी कथक की समृद्ध विरासत का हिस्सा हैं. यही विविधता कथक को जीवंत बनाती है और हर प्रस्तुति को अपना अलग रंग देती है.